न्यायमूर्ति शेखर बी. साराफ एवं माननीय न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ द्वारा जनहित याचिका संख्या 559/2026 (आशीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया। याचिकाकर्ता आशीष कुमार सिंह ने स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा।
याचिका में 25 मई 2026 के उस शासनादेश को चुनौती दी गई है, जिसके माध्यम से कार्यकाल समाप्त हो चुके ग्राम प्रधानों एवं ग्राम पंचायत सदस्यों को ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त किया गया है।
याचिका में यह तर्क रखा गया कि 26 मई 2026 को कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासक बनाकर कार्यरत रखना संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भावना एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। यह चुने हुए प्रतिनिधियों के कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने का प्रयास है।
समय रहते क्यों नहीं तय हुआ आरक्षण
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि, आरक्षण निर्धारण से संबंधित विषय सरकार के संज्ञान में काफी समय से था और इस दिशा में अपेक्षित तत्परता से कार्य किया जाना चाहिए था।
न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग एवं ओबीसी आयोग को निर्देशित किया है कि, वे पंचायत चुनावों एवं आरक्षण प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति एवं प्रगति के संबंध में 10 जुलाई 2026 तक अलग-अलग शपथपत्र प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई को निर्धारित की गई है।
यह जनहित याचिका उत्तर प्रदेश में पंचायतों की संवैधानिक स्वायत्तता, लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था और समयबद्ध पंचायत चुनावों के प्रश्न से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
प्रधानों को नियुक्त किया प्रशासक
यूपी की ग्राम पंचायतों में प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को खत्म हो चुका है। इस बीच शासन ने प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का आदेश जारी कर दिया है। उधर, पंचायतों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग भी गठित कर दिया। लेकिन प्रधानों को ही प्रशासक बनाने और चुनावों में देरी को कोर्ट में चुनौती दी गई है और कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रही है।
