नई दिल्ली, 20 मई (आईएएनएस)। भारत-स्वीडन की साझा सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके स्वीडिश समकक्ष पीएम उल्फ क्रिस्टर्सन ने एक ओप-एड में बखूबी बयां किया है। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए इसकी जानकारी दी।
प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन के साथ लिखे गए ओप-एड में यह बताया गया कि कैसे भारत और स्वीडन एक नए सहयोग के युग को आकार दे रहे हैं। ग्रीन ट्रांजिशन से लेकर आपूर्ति श्रृंखलाओं तक, इस साझेदारी की नींव नवाचार, स्थिरता और साझा समृद्धि पर आधारित है, जिसका लाभ दोनों देशों की जनता को मिलना तय है।
‘नरेंद्र मोदी’ ब्लॉग पर प्रकाशित संपादकीय में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता, ऊर्जा असुरक्षा और आर्थिक विखंडन के दौर में दुनिया को एक निर्णायक विकल्प का सामना करने के लिए तैयार रहने की बात है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, आदर्श नियमों और जलवायु परिवर्तन को समझ कर आगे बढ़ने का जिक्र किया गया है।
संपादकीय के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ के मौके पर, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद का महत्व और भी स्पष्ट हो गया है। साथ ही, वैश्विक शासन संस्थाओं को आधुनिक यथार्थ के अनुरूप सुधारने की आवश्यकता भी अब अनिवार्य बन गई है।
एक कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता पर आधारित है, ने दशकों तक स्थिरता और विकास प्रदान किया। जलवायु परिवर्तन, इंडस्ट्रियल ट्रांसफॉर्मेशन, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और एनर्जी ट्रांजिशन जो वर्तमान की चुनौतियां है नवीनीकृत, व्यावहारिक और समावेशी सहयोग की मांग करती हैं।
जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण हैं। यह सभी क्षेत्रों और समाजों को प्रभावित करती है, चाहे वह भारत हो, स्वीडन या कहीं और। लेकिन क्लाइमेट एक्शन को विकास की आकांक्षाओं से अलग नहीं किया जा सकता। अरबों लोग बेहतर जीवन स्तर, रोजगार, आधुनिक अवसंरचना और ऊर्जा की पहुंच की तलाश में हैं। इसलिए विकास और अवसर प्रदान करना जबकि स्थिरता को बढ़ावा देना कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह हमारे समय का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक कार्य है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा है और साथ ही सबसे बड़े नवीकरणीय एनर्जी ट्रांजिशन में से एक को भी आगे बढ़ा रहा है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है: जलवायु महत्वाकांक्षाओं को विकास की वास्तविकताओं के साथ जोड़ना।
लेख में भारत के दो प्रमुख लक्ष्यों का वर्णन है। पहला, 2047 तक ‘विकसित देश’ का दर्जा हासिल करना और दूसरा, 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करना। ये दोनों ही आपस में गहराई से जुड़े हैं।
स्वीडन ने भी 98% जीवाश्म मुक्त बिजली ग्रिड के साथ यूरोप में क्लाइमेट एक्शन का नेतृत्व किया है। दोनों देशों का मानना है कि क्लाइमेट एक्शन (जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने वाले प्रयास) रोजगार, अवसर और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ा सकता है।
17 मई, 2026 को गोटेनबर्ग में हुई बैठक में इंडस्ट्रियल ट्रांसफॉर्मेशन, साफ ऊर्जा और तकनीकी सहयोग पर चर्चा की गई। लीडआईटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत और स्वीडन ने दिखाया कि विकसित और विकासशील देश साझा जिम्मेदारी और नवाचार के साथ समाधान बना सकते हैं।
दोनों देशों ने 2030 तक इस सहयोग को गहरा और व्यापक करने का आह्वान किया, ताकि स्वच्छ औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास दोनों सुनिश्चित हों।
आगे कहा गया है कि हर देश को हर समाधान खुद नहीं बनाना, लेकिन हर देश को अपनी विकासात्मक परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुसार तकनीक अपनाने और उसका दायरा बढ़ाने का मौका होना चाहिए। उत्सर्जन सीमाओं की परवाह नहीं करते और न ही समाधान कर सकते हैं। इसलिए, 2030 तक इस सहयोग को और विस्तार देने और गहरा करने का आह्वान किया गया है। नॉर्डिक साझेदारों और अन्य देशों को शामिल होने और सक्रिय योगदान देने के लिए आमंत्रित किया गया है।
सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, और कम-कार्बन औद्योगिक समाधान सभी देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुसार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
कोई देश अकेले हर तकनीक, खनिज या औद्योगिक इनपुट सुरक्षित नहीं कर सकता। जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है। यह अवसर केवल जलवायु नीति तक सीमित नहीं है। यह औद्योगिक सहयोग के नए युग को आकार देने का मौका है। भारत और स्वीडन इस दृष्टिकोण को लेकर प्रतिबद्ध हैं।
संदेश साफ है कि वैश्विक चुनौतियों में विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि सहयोग ही स्थायी विकास और साझा समृद्धि का मार्ग तय करेगा।
–आईएएनएस
केआर/
