इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति को आठ दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को छह सप्ताह के भीतर पीड़ित को दो लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
25,000 का मुआवजा देगी सरकार
अदालत ने यह राशि अवैध हिरासत के प्रत्येक दिन के लिए 25,000 रुपये की दर से निर्धारित की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार यह राशि पहले पीड़ित को अदा करे और बाद में सहायक पुलिस आयुक्त (बारा), प्रयागराज के खिलाफ विभागीय जांच पूरी होने के तीन माह के भीतर उससे इसकी वसूली करे। मंसूर अहमद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 14 सितंबर तक प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
जानें परिजनों ने क्या लगाया आरोप
परिजनों का आरोप है कि गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया और हिरासत के दौरान उनके साथ मारपीट की गई। याचिकाकर्ता को रिहा नहीं किए जाने पर 23 मार्च को यह याचिका दायर की गयी। पुलिस ने अपने जवाब में कहा कि शांति भंग की आशंका से संबंधित मामले में आवश्यक कार्रवाई की गई थी। इस मामले में हिरासत में लिया गया व्यक्ति शांति बनाए रखने के लिए निजी बॉन्ड नहीं भरता तो कानून के मुताबिक उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है।
अधिकारों का किया गलत इस्तेमाल
हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने निजी मुचलका भरने से इनकार किया था। अदालत ने आठ जून के अपने आदेश में कहा, ”प्रयागराज कमिश्नरेट में यह चौकाने वाली स्थिति है। पुलिस आयुक्त को एक मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं जिसका बुरी तरह से गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।”
