लखनऊ: शाही दस्तरख्वान और अवधी पाक-कला की अनूठी विरासत, नवाबों का शहर और जायके का सफर

लखनऊ के अवधी व्यंजन जगप्रसिद्ध हैं। यहां के नवाबों ने खानपान के बहुत से व्यंजन चलाए हैं। व्यंजन खुशरंग, सुगंधित और स्वादिष्ट होता है, तो उससे पेट ही नहीं भरता, बल्कि लज्जत और स्वाद के उस मापदंड पर खरा उतरता है, जो कोई न कोई संस्कृति शताब्दियों के बाद उत्पन्न करती है। मुगलकाल में अवध प्रांत अपनी समृद्धि के लिए विख्यात था। यहां के नवाब वाजिद अली शाह अपने शाही अंदाज और शान-ओ-शौकत के लिए मशहूर थे। उन्हें लजीज खाने का बेहद शौक था। शाही रसोई में उनके खानसामे तरह-तरह के मुगलई लजीज पकवान बनाया करते थे और वहां ये पारंपरिक पकवान आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं। गरम मसालों की खुशबू से भरपूर लज्जतदार अवधी व्यंजन आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं। नवाबी दौर में लजीज व्यंजनों की अवधी पाकशैली अपने उरूज पर थी।

लखनऊ का प्रसिद्ध रोटी बाजार

रोटियों में शीरमाल, कुल्चा, रूमाली की मांग सबसे ज्यादा होती है, अन्य तरह की रोटियों की मांग मोहर्रम और रमजान में बढ़ जाती है। आर्डर तैयार करने में कारीगरों को 12 घंटों के बजाय 18 घंटे या उससे अधिक काम करना पड़ता है। क्योंकि रमजान के महीने में बिक्री का समय दिन में न होकर देर शाम से पूरी रात चलता है यानी शाम चार बजे से सुबह चार बजे तक। इस इलाके में बनने वाली तमाम रोटियों में से सर्वाधिक बिक्री शीरमाल की ही होती है। केसरी रंग वाली शीरमाल मैदे, दूध व घी से बनती है, जो बहुत ही खास्ता और सुस्वादु होती है। तंदूर में पकाने के बाद इन पर खुशबू के लिए घी लगाया जाता है। शीरमाल ‘कबाब’ और कोरमे की लज्जत बढ़ाती है। शीरमाल का वजन के हासिब से रेट तय होता है यानी 110 ग्राम से 200 ग्राम की शीरमाल 4 से 7 रुपये प्रति पीस बिकती है। इस गली के बाहर ही कई नामी होटल हैं, जहां स्पेशल शीरमाल तैयार की जाती है। विशेषज्ञ के अनुसार शाही खाने में गिनी जाने वाली बाकरखानी रोटी अमीरों के दस्तरखान की बहुत ही विशिष्ट रोटी थी। इसमें मेवे और मलाई का मिश्रण होता है। ये नाश्ते में चाय का आनंद बढ़ा देती है। कारीगर बताते हैं कि बाकरखानी और ताफतान की मांग अब कम ही हो चली है। नान की मांग आम दिनों में कम रहती है। लोग शादी-ब्याह या खास अवसर पर आर्डर देकर नान बनवाते हैं। नान को नर्म व स्वादष्टि बनाने के लिए मैदे में दूध, दही, घी और रवा मिलाया जाता है। एक उक्ति के अनुसार लखनऊ के व्यंजन विशेषज्ञों ने ही परतदार पराठे की खोज की है, जिसको तंदूरी परांठा भी कहा जाता है। इन पराठों को तंदूर में तैयार किया जाता है। पराठे नर्म रहे इसलिए इन्हें पानी की छीटें देकर उस पर घी से तर किया जाता है। ईरान से आई रोटी यानी कुलचा पर स्थानीय प्रभाव रहता है। इसी तरह लखनऊ वालों ने भी कुलचे में विशेष प्रयोग किए। कुलचा नाहरी के विशेषज्ञ कारीगर हाजी जुबैर अहमद के अनुसार कुलचा अवधी व्यंजनों में शामिल खास रोटी है, जिसका साथ नाहरी बिना अधूरा है। लखनऊ के गिलामी कुलचे यानी दो भाग वाले कुलचे उनके परदादा ने तैयार किए। कुलचे रिच डाइट में आते हैं और जुबैर साहब के अनुसार अच्छी खुराक वाला आदमी भी तीन से अधिक नहीं खा सकता है। कुलचे गर्म खाने में ही मजा है यानी तंदूर से निकले और परोसा जाए।

दस्तरख्वान: केवल भोजन नहीं, एक संस्कृति

महान विद्वान टीएस इलियट के अनुसार, जब किसी सभ्यता का पतन होने को होता है, तो सबसे पहले उसका दस्तरखान उलटता है। दस्तरखान केवल शाही दरबार अमीरों के महलों और रइसों के दरबारों और ड्योढ़ियों तक सीमित नहीं था। सामान्य घरों में भी लखनऊ का दस्तरखान अपनी बेमिसाली के लिए मौजूद था। तबाखीर के फनकारों का एक वर्ग था, जिसने नमकीन और मीठे व्यंजनों की तैयारी और उपलब्धता में अपनी फनकारी के कमाल दिखाए थे। लखनऊ की रीतियों की जानकारी रजबअली बेग सुरूर और अब्दुल हलीम शरर की तहरीरों (रचनाओं) से भी मिलती है, जिसे पंडित रतननाथ ने अपनी पुस्तकों में इंगित किया है। पुस्तकों में इसका प्रत्यक्ष कम, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भ और उऋ ण अधिक मिलते है। शायद लखनऊ के दस्तरखाना की खोदई इतिहास, इसकी स्वच्छता, कोमलता व मृदुलता का स्तर इतिहास के बिखरे हुए पृष्ठों में तलाश करने की बात है। इनके मूल्यांकन करने के उपरांत जरूर इसी खोई हुई चीज को प्राप्त करने का पता चल सकता है। इससे कहीं ज्यादा उत्साहवर्धक बात यह है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भी लखनऊ वालों के मिले-जुले स्मरण में अपने दस्तरखान की अनुपामता और परख की चेतना बाकी है, बावर्चियों और तबाखों के गुजरे हुए फन के उत्तराधिकारी आज भी मौजूद है, जो बहुत कुछ भल जाने के बावजूद भी बहुत कुछ नहीं भूल सके हैं।

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