गिरीश कर्नाड : 'महाभारत' से मिली प्रेरणा तो रचा 'ययाति', अतीत की कहानियों में खोजे वर्तमान के सवाल


मुंबई, 9 जून (आईएएनएस)। भारतीय रंगमंच, साहित्य और सिनेमा जगत के बहुमुखी प्रतिभा के धनी गिरीश कर्नाड उन चुनिंदा रचनाकारों में थे, जिन्होंने भारतीय इतिहास, पुराण और लोककथाओं को आधुनिक समाज के सवालों से जोड़कर नई पहचान दी।

19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में जन्मे गिरीश कर्नाड का परिवार मूल रूप से कर्नाटक से था। उनकी शुरुआती शिक्षा मराठी भाषा में हुई, लेकिन बचपन से ही उनका जुड़ाव कर्नाटक की लोक संस्कृति और रंगमंच से हो गया। सिरसी और बाद में धारवाड़ में रहते हुए उन्होंने लोकनाट्य यक्षगान को करीब से देखा, जिसने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।

गिरीश कर्नाड मानते थे कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और समय से संवाद करने का सशक्त साधन भी है। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक सोच के साथ जोड़कर नई दिशा दी।

धारवाड़ से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कर्नाड हायर एजुकेशन के लिए इंग्लैंड गए। वहां ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। विदेश में रहते हुए भी भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रति उनका लगाव बना रहा। विदेश से लौटकर उन्होंने चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में काम किया, लेकिन उनका मन साहित्य और नाटकों की ओर अधिक था।

गिरीश कर्नाड ने 1961 में लेखन की शुरुआत की। उनका पहला नाटक ‘ययाति’ था, जो महाभारत के एक पात्र पर आधारित था। इस नाटक ने उन्हें साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई। सी. राजगोपालाचारी द्वारा लिखित महाभारत का संस्करण पढ़ने के बाद गिरीश कर्नाड पर उसके पात्रों का गहरा प्रभाव पड़ा था। उन्हें महसूस हुआ कि महाभारत के पात्र जैसे उनके मन में जीवंत हो उठे हैं और उनसे संवाद कर रहे हैं।

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह सिर्फ माध्यम थे, पात्रों की आवाज खुद उनके भीतर गूंजती रही और वे उसे लिखते गए। इसी प्रेरणा से उनका पहला नाटक ‘ययाति’ तैयार हुआ। महाभारत के पात्र ययाति पर आधारित यह नाटक काफी लोकप्रिय हुआ और बाद में इसका कई भाषाओं में अनुवाद भी किया गया।

इसके बाद 1964 में लिखा गया ‘तुगलक’ भारतीय रंगमंच का एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस नाटक के जरिए उन्होंने इतिहास को समकालीन राजनीति और समाज से जोड़कर प्रस्तुत किया। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता बनी। इसके बाद ‘हयवदन’, ‘नागमंडल’, ‘तालेदंड’ और ‘अग्नि मट्टु माले’ जैसे नाटकों ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उनके कई नाटकों का विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और दुनिया भर में मंचन किया गया।

रंगमंच के साथ-साथ गिरीश कर्नाड ने सिनेमा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में अभिनेता, निर्देशक और पटकथा लेखक के रूप में काम किया। ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘स्वामी’, ‘मेरी जंग’, ‘सुर संगम’, ‘इकबाल’, ‘एक था टाइगर’ और ‘टाइगर जिंदा है’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा।

दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ में उन्होंने स्वामी के पिता की भूमिका निभाई थी। वहीं विज्ञान आधारित कार्यक्रम ‘टर्निंग पॉइंट’ के प्रस्तोता के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

गिरीश कर्नाड को साहित्य, रंगमंच और सिनेमा में उनके योगदान के लिए पद्मश्री, पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले।

10 जून 2019 को 81 वर्ष की आयु में इतिहास, साहित्य और सिनेमा के मजबूत सेतु रहे गिरीश कर्नाड का निधन हो गया।

–आईएएनएस

एमटी/एबीएम


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