यौन अपराधों में पीड़िता की गरिमा और मानसिक आघात को भी महत्व मिले: राष्ट्रीय महिला आयोग अध्यक्ष विजया राहटकर


नई दिल्ली, 15 जुलाई (आईएएनएस)। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया राहटकर ने पटना हाईकोर्ट के एक फैसले के संदर्भ में कहा है कि यौन अपराधों की व्याख्या केवल शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, भय और मानसिक आघात को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

विजया राहटकर ने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कानून की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को पीड़िता के वास्तविक अनुभवों और कानून की मूल भावना के साथ संतुलन बनाए रखना चाहिए। यदि न्याय व्यवस्था पीड़ितों के अनुभवों से अलग दिखाई देती है, तो इससे लोगों का न्याय प्रणाली पर विश्वास प्रभावित हो सकता है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि अदालतें कानून और उनके सामने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी यदि पीड़िता को न्याय मिलने का अनुभव नहीं होता, तो यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि गंभीर यौन अपराधों में दोषियों को प्रभावी सजा नहीं मिलने से महिलाओं के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के पीड़िता-केंद्रित और संवेदनशील दृष्टिकोण का स्वागत किया।

विजया राहटकर ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता के साथ हुई मानसिक और भावनात्मक पीड़ा को समझना आवश्यक है। उन्होंने जोर दिया कि न्याय व्यवस्था को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए ताकि पीड़ित महिलाओं को न्याय का वास्तविक अनुभव मिल सके।

उन्होंने विश्वास जताया कि भारतीय न्याय प्रणाली महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करते हुए भविष्य में और अधिक संवेदनशील, पीड़िता-केंद्रित और लैंगिक न्याय आधारित दृष्टिकोण को मजबूत करेगी।

गौरतलब है कि पटना हाईकोर्ट के एक फैसले के संदर्भ में राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से यह प्रतिक्रिया सामने आई है। आयोग लगातार महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और न्याय तक उनकी पहुंच को मजबूत करने के मुद्दों पर अपनी भूमिका निभाता रहा है। आयोग का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में कानून के साथ-साथ पीड़िता की गरिमा और अनुभवों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

–आईएएनएस

एससीएच


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