10वीं मोहर्रम को पुराना लखनऊ कर्बला के शहीदों के गम में डूबा रहा। इमामबाड़ों में सुबह से शुरू हुआ मातम-मजलिस का सिलसिला देर रात में अल विदाई अलम के जुलूस तक जारी रहा। इमामबाड़ा गुफरानमआब में अशरा-ए-मजालिस को खिताब करते हुए मौलाना कल्बे जवाद ने कहा कि सृष्टि का निर्माण करने वाले ने इस दुनिया को चलाने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया है, उसी के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल कर इंसान जंग का माहौल बदलने में कामयाब हो गया है।
उन्होंने कहा कि सांप के कान नहीं होते इसलिए वो सुन नहीं सकता, लेकिन उसके पास ऐसी ताकत है कि वो कम्पन को महसूस कर लेता है। कम्पन के जरिये वह उस दिशा के बारे में भी जान लेता है जिधर से कोई उसकी तरफ आ रहा है। ईरान ने अपने हथियारों में इसी तकनीक का इस्तेमाल किया है।
अकबरी गेट स्थित इमामबाड़ा सैय्यद तकी साहब में मौलाना सैफ अब्बास नक़वी ने कहा कि मजलिसों में क़ुरान-ए-करीम और हदीस-ए-पैगंबर के जरिए यह बात समझाने की कोशिश की गई कि विलायत दीन का हिस्सा है। अगर कोई विलायत को नहीं मानता है तो दीन व इस्लाम से ख़ारिज होगा।
मौलाना ने कहा कि मौला अली को हमने अपना इमाम खुद नहीं बनाया बल्कि अल्लाह ने इमाम बनाया। जब अल्लाह ने इमाम बनाया तो हमने इमाम माना। मौलाना ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन की शिक्षाओं तथा कर्बला की घटना को जन जन तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन और उनके परिजन शहीद हो गए लेकिन आज भी अमर हैं। यजीद समझ रहा था की वो जीत गया लेकिन आज उसका नाम लेने वाला भी कोई नहीं।
