कोलकाता, 18 जून (आईएएनएस)। रेलवे ने एक बड़ी पहल के तहत थर्मल पावर प्लांट से बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश को उन फैक्ट्रियों तक पहुंचाने का फैसला किया है, जो इसे कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल करती हैं। इसके लिए खास तरह के वैगन इस्तेमाल किए जाएंगे।
इस तरह से सामान पहुंचाना न सिर्फ सस्ता होगा, बल्कि सड़क परिवहन के मुकाबले पर्यावरण के लिए भी बेहतर होगा। इस पहल से हाउसिंग सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले सीमेंट, ब्लॉक और ईंटों की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी।
यह फैसला रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया। इस बैठक में रेल राज्य मंत्री वी. सोमन्ना और रवनीत सिंह बिट्टू भी मौजूद थे।
फ्लाई ऐश थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला एक वेस्ट मटीरियल (बेकार पदार्थ) है। इसका इस्तेमाल सीमेंट, कंक्रीट ब्लॉक और ईंटें बनाने तथा सड़कें बनाने में किया जाता है। इस तरह यह देश भर में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में मदद करता है।
एक बयान के मुताबिक, थर्मल पावर प्लांट से हर साल लगभग 340 मिलियन टन फ्लाई ऐश निकलती है। इसका कुछ हिस्सा सड़क मार्ग से और कुछ हिस्सा बार्ज (बड़ी नावों) के जरिए बांग्लादेश भेजा जाता है, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा पावर प्लांट में ही पड़ा रहता है, जिससे इस प्रदूषण फैलाने वाले मटीरियल को ठिकाने लगाने में मुश्किल होती है।
बयान में कहा गया है कि रेलवे अब खास कंटेनरों और रेल कॉरिडोर का एक समर्पित लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बना रही है ताकि इस वेस्ट मटीरियल को वहां से पहुंचाया जा सके जहां यह पैदा होता है, और वहां तक जहां इसकी जरूरत है।
इसमें कहा गया है कि इस पहल की खासियत इसकी सादगी में है। जिसे पावर प्लांट बेकार समझकर फेंक देते हैं, उसे सीमेंट प्लांट कीमती मानते हैं। अगर फ्लाई ऐश को सही तरीके से पहुंचाया और इस्तेमाल किया जाए, तो यह सीमेंट, कंक्रीट, ब्लॉक और बोर्ड के लिए कच्चा माल बन जाती है। फ्लाई ऐश के सस्ते होने का मतलब है सस्ती ईंटें, सीमेंट की कम कीमतें और आखिरकार शहरी और ग्रामीण भारत, दोनों ही जगहों पर लोगों के लिए घर खरीदना आसान होना।
रेलवे ऐसे खास वैगनों का इस्तेमाल करेगी जिन्हें पावर प्लांट में सीधे ऊपर से भरा जा सके और फिर सील किया जा सके। फैक्ट्रियों में, इन खास टिपर वैगनों को पीछे से खाली किया जा सकेगा।
बयान में कहा गया, “रेल वैगनों और खास तौर पर बनाए गए लॉजिस्टिक्स सिस्टम के अंदर फ्लाई ऐश साफ-सुथरे तरीके से पहुंचती है। यह प्रदूषण फैलाने वाली चीज के तौर पर नहीं, बल्कि भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी में एक उपयोगी हिस्सेदार के तौर पर पहुंचती है।”
–आईएएनएस
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