प्रोजेक्ट 18 क्रूजर साइज के युद्धपोतों और फ्यूचरिस्टिक कॉम्बैट सिस्टम के साथ भारतीय नौसेना को देगा नई पहचान: रिपोर्ट


एथेंस, 7 जून (आईएएनएस)। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट 18’ प्रोग्राम धीरे-धीरे आकार ले रहा है और उम्मीद है कि यह भारतीय नौसेना द्वारा अब तक शुरू किए गए सबसे शक्तिशाली सरफेस कॉम्बैटेंट प्रोजेक्ट्स में से एक होगा।

ग्रीक सिटी टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि अगली पीढ़ी का डिस्ट्रॉयर भविष्य के समुद्री युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइन किए गए एक बहुत बड़े क्रूजर-क्लास वॉरशिप में बदल रहा है।

हाल की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित प्लेटफॉर्म मौजूदा भारतीय डिस्ट्रॉयर की तुलना में साइज और क्षमता में काफी बढ़ा है। इसमें बताया गया है कि वॉरशिप का डिस्प्लेसमेंट अब पूरे लोड पर 11,000 और 13,000 टन के बीच होने की उम्मीद है। इसकी कुल लंबाई लगभग 180 मीटर तक पहुंच सकती है, जो इसे नौसेना के मौजूदा फ्रंटलाइन डिस्ट्रॉयर से काफी ऊपर की कैटेगरी में रखती है।

यह संकेत देता है कि जहाज को इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (आईईपी) प्रणाली से संचालित किया जाएगा। भविष्य के युद्धपोतों के लिए इस तकनीक को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह अधिक मात्रा में विद्युत उत्पादन करने के साथ-साथ जहाज के ध्वनिक हस्ताक्षर (अकूस्टिक सिग्नेचर) को कम करने में सक्षम है। इससे युद्धपोत की परिचालन क्षमता और गोपनीयता दोनों में वृद्धि होती है।

इस प्रकार की प्रोपल्शन व्यवस्था अगली पीढ़ी की युद्धक क्षमताओं के लिए आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराएगी। इसमें उन्नत रडार प्रणालियां, डायरेक्टेड-एनर्जी हथियार और अन्य उच्च-शक्ति वाले उपकरण शामिल हैं, जिन्हें आने वाले दशकों में नौसैनिक अभियानों का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

प्रोजेक्ट 18 में पूरे जहाज में बड़े पैमाने पर ऑटोमेशन शामिल होने की भी उम्मीद है, जिससे मौजूदा प्लेटफॉर्म की तुलना में क्रू की जरूरतें लगभग 25 से 30 प्रतिशत कम हो जाएंगी। मैनपावर में कमी का मकसद ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाना है, साथ ही लंबे समय तक मेंटेनेंस और कर्मचारियों की जरूरतों को कम करना है।

इस जहाज को सिर्फ एक डिस्ट्रॉयर के तौर पर नहीं, बल्कि एक मल्टी-डोमेन कमांड हब के तौर पर देखा जा रहा है जो कैरियर बैटल ग्रुप्स के अंदर कई तरह के एसेट्स को डायरेक्ट और कोऑर्डिनेट कर सके।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह जहाज अनमैन्ड एरियल व्हीकल (यूएवी), अनमैन्ड सरफेस वेसल (यूएसवी) और एक्स्ट्रा-लार्ज अनमैन्ड अंडरवाटर व्हीकल (एक्सएलयूयूवी) से जुड़े ऑपरेशन को मैनेज कर पाएगा, जिससे यह भविष्य के नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के माहौल में एक सेंट्रल नोड बन जाएगा।

रिपोर्ट में बताई गई सबसे खास बातों में से एक है प्लान किया गया हथियारों का लोडआउट। प्रोजेक्ट 18 में 144 वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) सेल होने की उम्मीद है, साथ ही इसमें और मिडशिप स्लैंट लॉन्चर भी हो सकते हैं। ऐसा कॉन्फिगरेशन इसे एशिया के सबसे भारी हथियारों वाले युद्धपोतों में से एक बना देगा।

इस जहाज में लेयर्ड एयर और मिसाइल डिफेंस आर्किटेक्चर होने की उम्मीद है, जिसमें प्रोजेक्ट कुशा के तहत लंबी दूरी की सरफेस-टू-एयर मिसाइलें, डेडिकेटेड एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम शामिल हैं, जो कथित तौर पर 250 से 350 किलोमीटर की दूरी पर खतरों से निपटने में सक्षम हैं, और पॉइंट-डिफेंस ड्यूटी के लिए वर्टिकल लॉन्च शॉर्ट रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें (वीएल-एसआरएसएएम) शामिल हैं।

अटैकिंग साइड पर रिपोर्ट में कहा गया है कि वॉरशिप में कई एडवांस्ड स्ट्राइक वेपन्स- एक्सटेंडेड-रेंज ब्रह्मोस मिसाइलें, लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइलें (एलआर-एलएसीएम), एसएमएआरटी एंटी-सबमरीन मिसाइल सिस्टम, और शायद भविष्य की ब्रह्मोस-II हाइपरसोनिक मिसाइल, जब यह ऑपरेशनल हो जाएगी, से लैस होने की संभावना है।

पारंपरिक हथियारों के अलावा, खबर है कि इस प्लेटफॉर्म को डायरेक्टेड-एनर्जी सिस्टम के लिए बेसिक प्रोविजन के साथ डिजाइन किया जा रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि 50-100 केडब्ल्यू के शिपबोर्न लेजर हथियारों को आखिरकार ड्रोन झुंड और दूसरे उभरते हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए पारंपरिक मिसाइल-बेस्ड इंटरसेप्टर की तुलना में ज्यादा कॉस्ट-इफेक्टिव तरीके से इंटीग्रेट किया जा सकता है।

जहाज के लिए प्लान किया गया सेंसर सूट भी उतना ही बड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोजेक्ट 18 में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन द्वारा डेवलप किया गया एक स्वदेशी एस-बैंड एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (एईएसए) रडार लगा होगा।

उम्मीद है कि यह रडार इजरायली एमएफ-स्टार सिस्टम की जगह लेगा, जो अभी कई भारतीय युद्धपोतों पर इस्तेमाल हो रहा है। जानकारी के अनुसार, यह 500 किलोमीटर से ज्यादा तक निगरानी कवरेज दे सकता है।

इस डिजाइन में स्टेल्थ-फोकस्ड फीचर्स भी शामिल होने की उम्मीद है, जिसमें कम दूरी तक दिखने वाला मास्ट स्ट्रक्चर, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और मुश्किल माहौल में बचने की क्षमता और हालात की जानकारी बढ़ाने के लिए एडवांस्ड मल्टी-डोमेन बैटल मैनेजमेंट क्षमताएं शामिल हैं।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारतीय नौसेना प्रोजेक्ट 18 के तहत चार से पांच जहाजों के शुरुआती प्रोडक्शन पर विचार कर रही है, और भविष्य में ऑपरेशनल जरूरतों और बजट के आधार पर इस प्रोग्राम को 10 से 12 जहाजों तक बढ़ाने की संभावना है।

भारतीय शिपबिल्डर्स में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स को जहाज बनाने के लिए सबसे आगे बताया जा रहा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विशाखापत्तनम-क्लास डिस्ट्रॉयर के अपग्रेडेड वर्शन पर आधारित एक अंतरिम प्रोजेक्ट 15सी प्रोग्राम को इंडस्ट्रियल एक्टिविटी को बनाए रखने और शिपबिल्डिंग की रफ्तार बनाए रखने के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है, जबकि प्रोजेक्ट 18 अपने डिजाइन और डेवलपमेंट फेज में मैच्योर होता रहेगा।

प्रोजेक्ट 18 भारत की नेवी की क्षमताओं में एक बड़ी छलांग होगी, जिसमें बड़ा डिस्प्लेसमेंट, लंबी दूरी की स्ट्राइक पावर, इंटीग्रेटेड एयर और मिसाइल डिफेंस, एडवांस्ड सेंसर, अनमैन्ड सिस्टम इंटीग्रेशन और फ्यूचर-ओरिएंटेड टेक्नोलॉजी शामिल होंगी।

इंडियन नेवी बिल्डर्स नेवी में बड़े बदलाव के जरिए मल्टी-डोमेन, नेटवर्क वाले खतरों का मुकाबला करने के लिए एक्टिव रूप से मॉडर्नाइज कर रही है। यह बदलाव स्वदेशी स्टेल्थ वॉरशिप, नेक्स्ट-जेनरेशन सबमरीन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इंटीग्रेशन और हिंद-प्रशांत में पावर दिखाने के लिए ब्लू-वॉटर कॉम्बैट कैपेबिलिटी को बढ़ाने पर ज्यादा फोकस करता है।

प्रोजेक्ट 18 भारतीय नौसेना के ब्लू-वॉटर ऑपरेशन्स और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक पावर प्रोजेक्शन के लॉन्ग-टर्म विजन को भी दिखाता है।

–आईएएनएस

केके/डीकेपी


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