यूपी: नई ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन’ योजना में नॉन-वेज व्यंजनों की अनदेखी पर उठे सवाल

 उत्तर प्रदेश सरकार की नई ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन’ योजना को लेकर खाद्य संस्कृति और प्रतिनिधित्व पर बहस शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने इस योजना के तहत हर जिले की एक पहचान वाले पारंपरिक व्यंजन को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और बाजार उपलब्ध कराने की रणनीति बनाई है, लेकिन सूची में राज्य के प्रसिद्ध नॉन-वेज व्यंजन शामिल नहीं किए जाने से एक नई बहस शुरू हो गई है। 

शासन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसको लेकर पूछे गए सवाल पर कहा कि नॉन वेज को न शामिल करने की सख्त हिदायत दी गई थी। इस योजना में नॉनवेज डिशों को शामिल करने से नया विवाद पैदा हो सकता था। वैसे अभी इस योजना के तहत जो लिस्ट जारी की गई है सरकार उसी के अनुसार काम करेगी।अधिकारियों के अनुसार प्रत्येक जिले के लिए एक “सिग्नेचर क्यूज़ीन” तय की जाएगी, जिसे मानकीकृत कर प्रदर्शनियों, फूड फेस्टिवल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए प्रचारित किया जाएगा। स्थानीय उत्पादकों को आधुनिक पैकेजिंग और कौशल विकास का भी लाभ मिलेगा। 

दरअसल लखनऊ की रेवड़ी, आम उत्पाद, चाट, मलाई मखन, हरदोई की आलू पूरी, लड्डू, लौझाड़, लखीमपुर खीरी का केला, गुड़, खोया पेड़ा, खीर मोहन, रसगुल्ल, रायबरेली के मसाले, मिर्चा पकौड़ा, पेड़ा, सीतापुर का बटर क्रीम, समोसा, उन्नाव का जामुन, समोसा, कुशाली और अन्य पारंपरिक मिठाइयां शामिल हैं । 

हालांकि, इस सूची में लखनऊ की विश्वप्रसिद्ध अवधी नॉन-वेज परंपरा कबाब, बिरयानी, निहारी और अन्य स्ट्रीट फूड को जगह नहीं मिलने पर सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2019 में यूनेस्को ने लखनऊ को उसकी समृद्ध अवधी खानपान परंपरा के लिए ‘क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ का दर्जा दिया था।गौरतलब है कि योजना की घोषणा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले वर्ष 8 नवंबर को की थी, जबकि इसका औपचारिक शुभारंभ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जनवरी को किया। यह पहल ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ मॉडल की तर्ज पर तैयार की गई है। योजना के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसके तहत कारीगरों और उद्यमियों को एकमुश्त 25 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 20 लाख रुपये तय की गई है। 

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