केसरिया न्यूज़, लखनऊ: नारी शक्ति वंदन अधिनियम को भारत में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया गया था, जिसका उद्देश्य देश की आधी आबादी को नीति-निर्धारण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाना था। यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को एक नई दिशा देने की परिकल्पना के साथ लाया गया था।
सरकार का मानना था कि यह पहल देश की नारी शक्ति के लिए एक महायज्ञ के समान है, जिससे न केवल राजनीति का भविष्य बल्कि देश की दिशा और नियति भी तय होती।
हालांकि, विपक्ष के राजनीतिक स्वार्थ के कारण इस सुधार को पूरा समर्थन नहीं मिल सका। आरोप लगाया गया कि विपक्ष ने 30 वर्षों तक महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को बाधित किया और इस बार भी अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हुए महिलाओं के हितों को दरकिनार कर दिया।
सरकार के अनुसार, देश की दादी-नानी, माताओं और बहनों ने लंबे समय से इस सुधार की प्रतीक्षा की थी, लेकिन विपक्षी रुख के कारण उन्हें और इंतजार करना पड़ा। इसे केवल सीटों का मुद्दा नहीं बल्कि भारतीय घरों की गरिमा और लोकतंत्र में उनकी भागीदारी का विषय बताया गया।
यह भी कहा गया कि विपक्ष ने महिलाओं के उच्च स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करने का प्रयास किया और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखने की कोशिश की।
सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष ने कई बार तकनीकी कारणों का हवाला देकर बिल का विरोध किया और देश को उत्तर-दक्षिण जैसे विभाजनकारी मुद्दों में उलझाने की कोशिश की।
पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण को स्वीकार करने के बावजूद, शीर्ष स्तर पर समान भागीदारी से बचने का भी आरोप विपक्ष पर लगाया गया।
सरकार ने कहा कि महिलाओं के कल्याण के लिए पिछले वर्षों में कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं, लेकिन इस महत्वपूर्ण सुधार को राजनीतिक कारणों से रोका गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
अंत में, सरकार ने कहा कि यह मुद्दा राजनीतिक लाभ का नहीं बल्कि नारी शक्ति के सम्मान और सशक्तिकरण का है, और भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।
