- इंटैक ने धूमधाम से मनाया विश्व धरोहर दिवस, शहर में निकाली गई विरासत यात्रा
- अवध की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को उजागर किया गया
- अवध की लोक परंपराओं पर विद्वानों ने की चर्चा
केसरिया न्यूज़, लखनऊ: इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) लखनऊ चैप्टर ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एसआई), अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज, बीकेटी स्कूल, जागृति लोरेटो स्कूल, मॉडर्न एकेडमी और खुनखुनजी गर्ल्स पीजी कॉलेज के साथ मिलकर जीवंत विश्व धरोहर दिवस कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें विरासत वॉक (यात्रा) और शैक्षणिक संगोष्ठी के द्वारा अवध की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को उजागर किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विरासत विशेषज्ञ एके श्रीवास्तव द्वारा जागृति लोरेटो स्कूल के छात्रों के लिए हजरतगंज में आयोजित विरासत वॉक से हुई।
वॉक सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा से शुरू होकर कोठी नूर बख्श, तारावली कोठी (रॉयल ऑब्जर्वेटरी), कंकर वाली कोठी और दिल्ली एंड लंदन बैंक सहित ‘गंज’ की ऐतिहासिक विरासत को जोड़ते हुए उत्तरी रेलवे के डीआरएम कार्यालय और वर्ष 1857 की प्रमुख प्रतिरोध स्थलों तक पहुंची। इससे छात्रों के लिए शहर के शहरी और सैन्य इतिहास की एक स्पष्ट समझ बनी।
दूसरा विरासत भ्रमण कार्यक्रम भारतीय पुरातत्व संरक्षण, लखनऊ सर्कल के सहयोग से लखनऊ रेजीडेंसी में आयोजित की गई, जहां भागीदारों ने स्थल की वास्तुकला के विलय, साहस और संघर्ष के इतिहास का अवलोकन किया, जिसने 19वीं शताब्दी के लखनऊ को आकार दिया।
अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज के साथ मिलकर ‘अवध की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत: लोक परंपराएं, रंगमंच, साहित्य और गीत’ शीर्षक संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी के दो विचारोत्तेजक विशेषज्ञ चर्चाओं में पहला ‘अवध का लोक रंगमंच’ था, जिसमें प्रमुख रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ, गोपाल सिन्हा, ललित पोखरिया और प्रफुल्ल त्रिपाठी ने पारंपरिक और आधुनिक नाट्य प्रणालियों, सहित क्षेत्रीय लोकरूपों के अपने दीर्घकालिक अनुभव साझा किए। उन्होंने अवध की नाट्य परंपराओं की ऐतिहासिक समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए दस्तावेजीकरण, पुनरुद्धार और संस्थागत समर्थन के लिए आह्वान किया।
अवधी भाषा के संरक्षण पर जोर
दूसरी विशेषज्ञ चर्चा, ‘अवध की लोक परंपराएं: परंपरा और पहचान’ शीर्षक से आयोजित हुई, जिसमें पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह अवधी लोक साहित्य की प्रमुख विद्वान और जानी-मानी कवयित्री और सांस्कृतिक कार्यकर्ता विनीता मिश्रा शामिल हुईं। पैनलिस्टों ने अवधी संस्कृति, भाषा और मौखिक परंपराओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए अवधी भाषा और मौखिक परंपराओं के संरक्षण के महत्व पर जोर दिया।
कार्यक्रम का एक विशेष अंश मिरासिन समुदाय पर केंद्रित था, जो लग्न, जन्म और अन्य शुभ अवसरों पर लोक गीत गाकर परंपरा को जीवित रखने वाली महिला कलाकारों का पारंपरिक समूह है। ‘मिरासिन’ शब्द ‘मिरास’ (विरासत) से व्युत्पन्न है, जो उनकी अमूर्त विरासत के संरक्षक के रूप में भूमिका को रेखांकित करता है।
यह कार्यक्रम इंटैक लखनऊ चैप्टर की संयोजक डॉ. नीतू अग्रवाल द्वारा प्रस्तावित और आयोजित किया गया, जिसमें एनकेएस चौहान, कनक रेखा चौहान, डॉ. सुमना वार्ष्णेय, एके श्रीवास्तव, प्रो. निशि पांडेय और डॉ. पारुल सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
