लखनऊ तक ट्रेन नेटवर्क पहुंचने में लग गए थे 14 साल,भाप इंजन से शुरुआत और अब बुलेट ट्रेन की दस्तक

कभी एक शहर से दूसरे नगर जाने के लिए बैलगाड़ी ही एकमात्र साधन थी। समय बदला और 16 अप्रैल 1853 को पहली बार ठाणे से मुंबई के बीच ट्रेन दौड़ी। लखनऊ भी इस रेल नेटवर्क से 14 साल के भीतर जुड़ गया और
23 अप्रैल 1867 को लखनऊ से कानपुर की 47 मील की दूरी तय करने के लिए रेल की शुरुआत हो गई। भाप के इंजन से शुरू हुआ रेलवे का सफर कई पड़ाव को पार करते हुए अब बुलेट ट्रेन में बदलने जा रहा है।

पिछले दिनों आम बजट में देश के जिन सेक्शन पर बुलेट ट्रेनें दौड़ाने की घोषणा की गई है, उसमें दिल्ली से लखनऊ होकर वाराणसी भी शामिल है। गुरुवार को भारत में रेलवे के सफर की शुरुआत को 173 साल और 23 अप्रैल को लखनऊ में रेल नेटवर्क के 159 साल पूरे हो जाएंगे।

एक कमरे में बंद होते थे भारतीय

भारतीय यात्रियों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता था। लखनऊ स्टेशन पर कोई भारतीय अपने परिचित को छोड़ने नहीं आ सकता था। ब्रिटिश सरकार के आदेश पर भारतीयों को लखनऊ स्टेशन के एक कमरे में बंद किया जाता था। ट्रेन आने के बाद पहले अंग्रेज उसमें बैठते थे। उसके बाद भारतीयों को ले जाकर टिकट दिलाने के बाद बैठाया जाता था।

सन 1875-76 की रिपोर्ट बताती है कि इस रेलवे ने उस साल 12 लाख 65 हजार 508 रुपये की आय निम्न श्रेणी के दर्जे में सफर करने वाले भारतीय यात्रियों से किराए के रूप में की थी। जबकि उच्च श्रेणी के यात्रियों से उसे केवल 70 हजार 166 रुपये ही मिले थे।

सन 1879 की अवध प्रशासन की एक रिपोर्ट के अनुसार मई 1878 में भारतीय ड्राइवर की लापरवाही से मालगाड़ी की टक्कर कोयला गाड़ी से हो गई थी। इस हादसे से रेलवे को 40 हजार रुपये का नुकसान हुआ था। घटना का दोषी मानते हुए भारतीय ड्राइवर को पांच साल और गार्ड को चार साल की सजा दी गई थी।

ऐसे बदला रेलवे

मीटरगेज लाइन की भाप से दौड़ने वाली ट्रेनों से लेकर लखनऊ ने देश की कारपोरेट सेक्टर की पहली ट्रेन तेजस एक्सप्रेस, महाराजा एक्सप्रेस जैसी डीलक्स ट्रेन और शताब्दी व वंदे भारत एक्सप्रेस तक का सफर देखा। एक अगस्त 1925 को सत्तर लाख रुपये की लागत से लखनऊ स्टेशन बनकर तैयार हुआ।

इसी स्थान पर 26 दिसंबर से 30 दिसंबर 1916 तक आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में हिस्सा लेने आए महात्मा गांधी से पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुलाकात हुई थी।

ऐसे पड़ी ओआरआर की नींव

पूर्वी भारत में रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1857 में अवध रुहेलखंड रेलवे (ओआरआर) का गठन किया गया। इसका केंद्र बिंदु लखनऊ बनाया गया। लखनऊ में डीएस ऑफिस (मौजूदा डीआरएम ऑफिस) ओआरआर का मुख्यालय बना। ओआरआर ने लखनऊ से फैजाबाद (अब अयोध्या) होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (तब मुगलसराय ) को कोलकाता से जोड़ा। मात्र 18 साल में अवध व रुहेलखंड रेलवे का नियंत्रण 543 मील के नेटवर्क पर हो गया।

ओआरआर ने लखनऊ-कानपुर रेल लाइन के पांच साल के भीतर लखनऊ को फैजाबाद से जोड़ दिया। सन 1873 से 1875 तक दो साल में लखनऊ से शाहजहांपुर और फैजाबाद से जौनपुर तक लाइन का विस्तार हो चुका था। सन 1896 तक डालीगंज-मल्हौर-बाराबंकी होकर बुढ़वल और चौकाघाट पर रेल संचालन शुरू हो चुका था।

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