नई दिल्ली, 3 अप्रैल (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि देश की विदेश नीति तेजी से उसकी युवा आबादी की उम्मीदों और आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों को दिखा रही है। उन्होंने कहा कि जैसे भारत दुनिया के लिए मायने रखता है, वैसे ही दुनिया भी भारत के लिए मायने रखती है, इसलिए उसे अपनी प्रतिक्रियाओं में अधिक सावधानी और संतुलन अपनाना चाहिए।
भारतीय पॉडकास्टर और उद्यमी राज शमानी के यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान अकबरुद्दीन ने डिप्लोमेसी के बदलते नेचर पर बात की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के युवा भारतीयों की उम्मीदें पिछली पीढ़ियों से बहुत अलग हैं।
पूर्व आईएफएस अधिकारी ने कहा कि जहां पारंपरिक विदेश नीति ज्यादातर आइडियोलॉजिकल पोजीशनिंग पर केंद्रित करती थी, वहीं आज के युवा नौकरी के मौके, आसान वीजा एक्सेस और रेमिटेंस के बेहतर तरीकों जैसे प्रैक्टिकल नतीजों को लेकर ज्यादा चिंतित हैं।
उन्होंने कहा, “मैं देखता हूं कि युवा और आम भारतीय विदेश नीति से पारंपरिक लोगों की चाहत से कुछ और चाहते हैं। वे नौकरियां, मौके, बेहतर वीजा और रेमिटेंस चाहते हैं।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये उम्मीदें अब भारत के बाहरी जुड़ाव में कैसे दिख रही हैं।
अकबरुद्दीन ने कहा कि 1980 के दशक में ग्लोबल मुद्दों पर भारत का नजरिया कहीं ज्यादा मुखर और प्रतिक्रियात्मक था।
उन्होंने कहा, “हम अंतरराष्ट्रीय विकास पर ज्यादा खुलकर और जल्दी टिप्पणी करते थे। अगर लीबिया या वेनेजुएला में कुछ होता, तो हम उसकी सबसे पहले निंदा करते।”
हालांकि, उन्होंने बताया कि दुनिया के साथ देश के बढ़ते इकोनॉमिक इंटीग्रेशन के कारण ज्यादा सावधान और संतुलित रुख की जरूरत पड़ी है। 1980 के दशक में भारत का ग्लोबल इकोनॉमिक जुड़ाव लगभग 15-17 फीसदी था, जो अब बढ़कर लगभग 50 फीसदी हो गया है।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव ने भारत के लिए ज्यादा संयम और रणनीतिक आकलन के साथ काम करना जरूरी बना दिया है, क्योंकि वैश्विक विकास का अब घरेलू हितों पर सीधा असर पड़ता है।
उन्होंने कहा, “आज, जहां भारत दुनिया के लिए मायने रखता है, वहीं दुनिया भी भारत के लिए उतनी ही मायने रखती है। इसलिए, हमें अपने जवाबों में ज्यादा सावधान और सोच-समझकर काम करना चाहिए।”
भूराजनीतिक असलियत पर बात करते हुए अकबरुद्दीन ने कहा कि हर देश अंतरराष्ट्रीय संबंध में कुछ हद तक फायदे के साथ काम करता है। उन्होंने ईरान पर चीन के गहरे प्रभाव का जिक्र किया, क्योंकि वहां से तेल का बड़ा इंपोर्ट होता है और इसकी तुलना ऐसे ही हालात में यूरोपीय देशों के कम असर से की।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विदेश नीति के नतीजों को सिर्फ तुरंत के नतीजों के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि डिप्लोमेसी अक्सर धीरे-धीरे और प्रक्रिया पर चलने वाली कोशिश होती है।
उन्होंने कहा, “कुछ प्रक्रिया में समय लगता है, जबकि दूसरे तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। अलग-अलग देशों के पास अलग-अलग लेवल का लेवरेज होता है।”
भारत की ताकतों पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि देश का खाड़ी क्षेत्र में काफी असर है, जिससे उसे अपने हितों को असरदार तरीके से सुरक्षित करने में मदद मिली है। भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन उसके लेवरेज और नतीजों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वह दुनिया भर में हो रहे बदलावों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करता है या नहीं।
–आईएएनएस
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