उत्तर प्रदेश में अंत्योदय से अर्थव्यवस्था तक का सफर,योगी सरकार का समावेशी विकास

अंत्योदय की अवधारणा जब नीति की भाषा बनती है, जब योजनाओं की स्याही में उतरती है और जब ज़मीन पर साकार होती है तो इतिहास उसे केवल शासन नहीं, एक सभ्यतागत घटना कहता है। उत्तर प्रदेश आज ऐसी ही एक सभ्यतागत घटना का साक्षी है और पं. दीनदयाल उपाध्याय की उस अवधारणा को साकार कर रहा है, जिसमें वह विकास की परिभाषा अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में आए उजाले को मानते थे। ऐसा इसलिए है कि अब नेतृत्व में संकल्प दिखाई देता है, नीति में स्पष्टता है और सुशासन की नींव पर समावेशी विकास की इमारत खड़ी दिखाई देती है।

आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जो एक्सप्रेसवे व कॉरिडोर बन रहे हैं, जो क्लस्टर आकार ले रहे हैं, जो इंडस्ट्रियल पार्क व हब जीवंत हो रहे हैं, वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास नीति का मूर्त रूप हैं। वे उत्तर प्रदेश में दशकों से चली आ रही आर्थिक असमानता को मिटाने के उपकरण हैं। यह प्रदेश में कंक्रीट से संवारे जा रहे समावेशी विकास की जीवंत तस्वीर भी है। 

आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा

भारत की आत्मा गांवों में बसती है और योगी सरकार ने इस आत्मा को आर्थिक शक्ति देने का बीड़ा उठाया है। एक जनपद-एक उत्पाद जैसी योजना एक करोड़ से अधिक कारीगरों को प्रत्यक्ष लाभ देती है। जब वाराणसी का कोई बुनकर अपनी साड़ी सीधे ई-कॉमर्स प्लेटफार्म पर बेचने लगता है, तो वह केवल एक व्यापारी नहीं बनता, वह आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ता है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे क्षमता विस्तार के नए साधन हैं। जब पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के किनारे औद्योगिक क्लस्टर बनते हैं, तो आज़मगढ़ और मऊ का युवक सूरत या मुंबई जाने की मजबूरी से मुक्त होता है। गंगा एक्सप्रेसवे पर जब इंडस्ट्रियल नोड्स विकसित होते हैं, तो मेरठ से प्रयागराज तक का पूरा भूगोल बदल जाता है। ग्रेटर नोएडा में आईआईटीजीएनएल, बरेली में मेगा फूड पार्क, उन्नाव में ट्रांसगंगा सिटी, गोरखपुर में प्लास्टिक पार्क, गोरखपुर में गारमेंट पार्क तथा अनेक फ्लेटेड फैक्ट्री परिसर, यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ ही फिल्म सिटी, टॉय पार्क, अपैरल पार्क, हैंडीक्राफ्ट पार्क, लॉजिस्टिक हब व ऐसी ही अन्य योजनाएं आर्थिक ताकत की रीढ़ साबित होंगी। 

सामाजिक संकल्प की परियोजनाएं

उत्तर प्रदेश कभी अपनी विशालता के बोझ तले दबा था। इतनी बड़ी आबादी, इतना विस्तृत भूगोल, इतनी गहरी विषमताएं और इन सबके बीच एक ऐसी व्यवस्था जो थकी हुई थी, जो अपने ही नागरिकों को रोक नहीं पाती थी, जो पलायन को नियति मान चुकी थी। बुंदेलखंड की फटी धरती, पूर्वांचल की सूनी गलियां और पश्चिम की दबी हुई औद्योगिक क्षमता, यह उत्तर प्रदेश की वह तस्वीर थी जो दशकों से बदलने का नाम नहीं ले रही थी। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जब 2017 में कमान संभाली, तो उत्तर प्रदेश की पहचान बीमारू राज्य के रूप में थी। तब किसी ने शायद सोचा भी न था कि एक दिन यही प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में सबसे तेज़ धावक होगा, भारत की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा। 

समाधान का मॉडल बनता राज्य

सुशासन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, नैतिक और सामाजिक विजय है। इन्वेस्ट यूपी की स्थापना और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में प्रदेश की बेहतर रैंकिंग ने निवेश के वातावरण को जो नई ऊंचाई दी है, उसका सामाजिक अनुवाद यह है कि भ्रष्टाचार घटा है, पारदर्शिता बढ़ी है, और सरकार पर नागरिकों का विश्वास मज़बूत हुआ है। लॉजिस्टिक्स पार्क और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब का जाल बिछाते हुए योगी सरकार ने एक ऐसी कनेक्टिविटी दी है जो प्रदेश के हर कोने को एक साथ धड़कने की ताकत देती है। दादरी में विकसित हो रहा मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स हब एशिया के सबसे बड़े लॉजिस्टिक्स केंद्रों में से एक बनने की राह पर है। जब माल तेज़ी से पहुँचता है, जब किसान की उपज समय पर बाज़ार तक जाती है, जब निर्यातक की समयसीमा पूरी होती है तो इस पूरे चक्र में लाभान्वित होने वाला अंतिम व्यक्ति भी वही है, जो इस श्रृंखला की नींव है।

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