भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई में लंबे इंतजार के बाद बड़े संगठनात्मक बदलाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई मैराथन बैठकों के बाद प्रदेश कार्यकारिणी और क्षेत्रीय अध्यक्षों के नामों पर अंतिम सहमति बन गई है। पार्टी सूत्रों के अनुसार विश्व योग दिवस 21 जून के आसपास नई प्रदेश टीम की घोषणा की जा सकती है।सबसे बड़ा बदलाव महामंत्रियों के स्तर पर देखने को मिलेगा। प्रदेश संगठन में सात की जगह छह महामंत्री रखने की तैयारी है। इनमें पांच नए चेहरों को मौका मिलने की चर्चा है, जबकि वर्तमान महामंत्रियों में केवल एक नेता अपना पद बचाने में सफल दिखाई दे रहे हैं। सूत्रों के अनुसार 18 प्रदेश उपाध्यक्षों में से करीब 10 चेहरों की विदाई तय मानी जा रही है।
वहीं 16 प्रदेश मंत्रियों में से कई नेताओं को पदोन्नति देकर नई जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। पार्टी संगठन में लंबे समय से जमे नेताओं को नई भूमिका देकर संगठन में ताजगी लाने की रणनीति पर काम किया गया है।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह ने पिछले कई महीनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, संगठन के केंद्रीय नेताओं और शीर्ष नेतृत्व के साथ कई दौर की बैठकों में नए संगठनात्मक ढांचे पर चर्चा की। जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर मंथन के कारण प्रक्रिया अपेक्षा से अधिक लंबी चली।
भाजपा संगठन इस बार सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलकर नए चेहरों को मौका देने के पक्ष में दिख रहा है। पश्चिम, ब्रज और कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्रों में जातीय समीकरणों को नए सिरे से साधने की रणनीति बनाई गई है, जबकि अवध, गोरखपुर और काशी क्षेत्रों में सामाजिक संतुलन बनाए रखते हुए नए चेहरे सामने लाए जा सकते हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव और संगठन विस्तार को ध्यान में रखते हुए युवा, सक्रिय और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर है। पिछली 45 सदस्यीय प्रदेश कार्यकारिणी में 11 महिलाएं थीं, इस बार यह संख्या और बढ़ सकती है।
क्षेत्रीय अध्यक्षों के लिए जातीय समीकरण पर फोकस
पश्चिम क्षेत्र में क्षत्रिय चेहरे की जगह गुर्जर या वैश्य नेतृत्व की चर्चा है। ब्रज क्षेत्र में लोध समाज से नया चेहरा आगे आ सकता है। कानपुर-बुंदेलखंड में क्षत्रिय नेतृत्व को मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है। अवध और काशी क्षेत्र में ब्राह्मण एवं अन्य ओबीसी वर्गों के बीच संतुलन साधने पर जोर है, जबकि गोरखपुर क्षेत्र में भूमिहार समाज से ही नए चेहरे की तलाश की जा रही है।
