सुप्रीम कोर्ट आज से सबरीमाला मामले की लंबे समय से लंबित समीक्षा पर करेगा सुनवाई


नई दिल्ली, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। सबरीमाला मामले पर मंगलवार से सुनवाई शुरू हो रही है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने नौ जजों की एक विशेष बेंच (पीठ) का गठन किया है, जो इस काफी समय से रुके हुए मामले पर फिर से सुनवाई करेगी।

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर मंगलवार के लिए प्रकाशित मामलों की सूची के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ सितंबर 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी, जिसमें सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी, साथ ही उन संबंधित मुद्दों पर भी सुनवाई करेगी जो धार्मिक स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं।

नौ न्यायाधीशों की पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय में पीठ के समक्ष कार्यवाही सुबह 10:30 बजे शुरू होने वाली है।

सबरीमाला मामले के अतिरिक्त, शीर्ष अदालत से अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर विचार करने की भी अपेक्षा है।

इससे पहले, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तय किया था और स्पष्ट किया था कि इस मामले की स्वीकार्यता का निर्णय हो चुका है। साथ ही, इसने निर्णय हेतु सात महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी निर्धारित किए थे।

कार्यक्रम के अनुसार, पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्षों की दलीलें 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक सुनी जाएंगी, जिसके बाद पुनर्विचार का विरोध करने वालों की दलीलें 14 अप्रैल से 16 अप्रैल के बीच सुनी जाएंगी।

यदि कोई प्रतिवाद प्रस्तुत करना हो तो उस पर 21 अप्रैल को विचार किया जाएगा और अंतिम तर्क 22 अप्रैल को समाप्त होने की उम्मीद है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को पहले से लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था और समयसीमा का सख्ती से पालन करने पर जोर दिया था, यह देखते हुए कि संविधान पीठ के मामले अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

सुनवाई से पहले, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से दायर लिखित दलीलों में सर्वोच्च न्यायालय से धर्म की “समुदाय-केंद्रित” समझ अपनाने का आग्रह किया गया है। बोर्ड का कहना है कि अदालतों को आस्था-आधारित प्रथाओं की पुनर्व्याख्या करने से बचना चाहिए। उन्होंने “अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं” वाले पुराने नियम पर भी सवाल उठाए हैं।

वहीं, केंद्र सरकार के दूसरे सबसे वरिष्ठ विधि अधिकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार इन पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करती है।

–आईएएनएस

एसएके/एएस


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