पाकिस्तान की ‘प्रोपेगेंडा डिप्लोमेसी’ पर सवाल, खाड़ी क्षेत्र में घटती भूमिका उजागर


इस्लामाबाद, 27 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की पाकिस्तान की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने न केवल पाकिस्तानी टैंकर को लौटा दिया, बल्कि उसे होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति भी नहीं दी। साथ ही, तेहरान ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश और अमेरिका के युद्धविराम प्रस्तावों को भी खारिज कर दिया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम ने खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान की सीमित और लगातार घटती प्रभावशीलता को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ‘प्रोपेगेंडा आधारित कूटनीति’ उसकी वास्तविक कूटनीतिक ताकत को बढ़ाने के बजाय उसकी छवि को कमजोर कर रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अक्सर अपनी कूटनीतिक सक्रियता को दिखावटी तौर पर पेश करता है, जो वास्तविक रणनीतिक महत्व से अधिक शोर-शराबे पर आधारित होती है। खाड़ी क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए इस तरह के प्रयास उसे एक गंभीर मध्यस्थ के बजाय ‘प्रचारक’ के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान की कूटनीति मुख्य रूप से दो आधारों पर टिकी है- प्रतीकात्मक पहुंच और वैचारिक अपील। लेकिन समय के साथ ये दोनों ही कारक कमजोर होते जा रहे हैं। किसी भी प्रभावी कूटनीति के लिए विश्वसनीयता और रणनीतिक प्रासंगिकता जरूरी होती है, जो पाकिस्तान के मामले में कम होती जा रही है।

रिपोर्ट में कतर का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि उसने खुद को एक ‘ईमानदार मध्यस्थ’ के रूप में स्थापित किया है। कतर अमेरिका, ईरान, तालिबान और हमास जैसे विरोधी पक्षों के साथ भी संवाद बनाए रखने में सक्षम रहा है, जिससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है।

इसके विपरीत, पाकिस्तान की कूटनीति मीडिया और वैचारिक प्रचार पर ज्यादा निर्भर है, जिसमें ठोस रणनीतिक आधार की कमी दिखाई देती है। इससे उसकी मध्यस्थ के रूप में साख लगातार घट रही है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने में पाकिस्तान की भूमिका नगण्य रही। तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने कई बार मध्यस्थता की पेशकश की, लेकिन सऊदी अरब ने उसे खारिज कर दिया। अंततः 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच समझौता हुआ, जिसमें पाकिस्तान की कोई खास भूमिका नहीं रही।

अफगान शांति प्रक्रिया में भी पाकिस्तान ने खुद को प्रमुख मध्यस्थ बताया था, लेकिन समय के साथ तालिबान और टीटीपी के साथ उसके संबंध बिगड़ते गए, जिससे उसकी भूमिका कमजोर पड़ गई।

रिपोर्ट निष्कर्ष निकालती है कि केवल वैचारिक अपील और प्रचार आधारित कूटनीति के सहारे पाकिस्तान प्रभावी वैश्विक मध्यस्थ नहीं बन सकता, जब तक वह अपनी विश्वसनीयता, प्रासंगिकता और रणनीतिक भूमिका को मजबूत नहीं करता।

–आईएएनएस

डीएससी


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