नई दिल्ली, 8 मार्च (आईएएनएस)। महिला दिवस के मौके पर दिल्ली के विज्ञान भवन में दो दिवसीय राष्ट्रीय महिला विचारक सम्मेलन का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के दूसरे दिन मंच पर सात वक्ताओं का जमावड़ा है, जो अपने-अपने अनुभव के अनुसार महिलाओं के उत्थान की बात कर रहे हैं। कार्यक्रम में सिनेमा और मीडिया के जरिए महिलाओं की छवि पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पर भी बात की गई।
दो दिवसीय राष्ट्रीय महिला विचारक सम्मेलन के दूसरे दिन ‘प्रकृति और संस्कृति’ थीम रखी गई, जिसमें संस्कृति पर सिनेमा का प्रभाव और फिल्मों के जरिए महिलाओं को ऑबजेक्टिफाई करने जैसे गंभीर मुद्दों पर पैनल चर्चा की गई। चर्चा में दंगल, एनिमल, कबीर सिंह, और मिर्जापुर जैसी फिल्मों का जिक्र किया गया, जिनमें महिलाओं को एक वस्तु की तरह दिखाया गया और खुले तौर पर नशे को प्रमोट किया गया।
इस विषय पर बात करते हुए पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी किरण चोपड़ा ने कहा, “सिनेमा और ओटीटी का प्रभाव दर्शकों पर बहुत पड़ता है। सिनेमा पर दंगल फिल्म आई, जिसमें पहलवानी सीखती लड़की को दिखाया गया। उसे देखकर लोगों के मन में विचार आया है कि हमें भी अपनी बेटियों को इसी तरीके से आगे ले जाना चाहिए। वहीं, ऐसी फिल्में भी आईं, जिसमें सिर पर शराब का गिलास रखकर डांस किया गया। खुले में नशे को प्रमोट किया गया और उसके बाद सोशल मीडिया से लेकर हर घर में सिर पर गिलास रखकर डांस करने का ट्रेंड शुरू हो गया।”
उन्होंने कहा, “महिलाओं को मीडिया और सिनेमा एक वस्तु की तरह दिखाता है, जो गलत है। हम महिलाएं भावनात्मक तरीके से कमजोर होती हैं और खुद के कदम उठाने से डरती हैं, लेकिन इन चीजों में अब सुधार की जरूरत है क्योंकि महिला खुद में काफी है। अगर वो अपने अंदर की शक्तियों को पहचान ले।”
उधर, संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष संध्या पुरेचा ने भारतीय सौंदर्य शास्त्र और अपने वेद-पुराणों की तरह वापसी करने की बात कही। उन्होंने कहा कि आज के समय में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले बहुत बढ़ रहे हैं, जिन्हें हमारे वेद-पुराणों में अपराध माना गया है। पुराणों में स्त्री को शक्ति का रूप माना गया है और अब हमें अतीत से शिक्षा लेने की जरूरत है।
–आईएएनएस
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