मुद्राराक्षस: हिंदी साहित्य का वह लेखक, जिसकी जिंदगी में 'जून' और 'रोटी' रहे अहम किरदार

[ad_1]

202606123822932

नई दिल्ली, 12 जून (आईएएनएस)। कुछ लोगों की जिंदगी में कुछ तारीखें इतनी गहराई से दर्ज हो जाती हैं कि वे उनकी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं। हिंदी साहित्य के चर्चित लेखक, नाटककार, आलोचक और व्यंग्यकार मुद्राराक्षस की जिंदगी में भी ‘जून’ ऐसा ही महीना था। उनका जन्म 21 जून 1933 को लखनऊ के बेहटा गांव में हुआ और संयोग देखिए कि 83 साल बाद 13 जून 2016 को इसी शहर में उन्होंने अंतिम सांस ली।

मुद्राराक्षस की कहानी केवल ‘जून’ की नहीं है। यह ‘रोटी’ की भी कहानी है। उस रोटी की, जिसके लिए संघर्ष करने वाले लोगों की आवाज उन्होंने अपनी कलम से उठाई। उस रोटी की, जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए सम्मान और अधिकार का सवाल बन जाती है।

मुद्राराक्षस का असली नाम सुभाष चंद्र आर्य (गुप्ता) था। बाद में वे साहित्य जगत में मुद्राराक्षस के नाम से मशहूर हुए। इस नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। उनके शिक्षक और प्रसिद्ध आलोचक डॉ. देवराज ने अपनी पत्रिका में उनका एक लेख ‘मुद्राराक्षस’ नाम से प्रकाशित किया था। लेख में उन्होंने हिंदी कविता के प्रयोगवाद पर तीखी टिप्पणी की थी। शायद वही विद्रोही तेवर उन्हें पसंद आया और उन्होंने इस नाम को ही अपनी स्थायी पहचान बना लिया।

मुद्राराक्षस उन लेखकों में नहीं थे जो केवल किताबों के भीतर रहते हैं। वे सड़क, समाज और संघर्ष के लेखक थे। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल थे, व्यवस्था से असहमति थी और उन लोगों के लिए गहरी संवेदना थी जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यही कारण है कि दलित, पिछड़े और वंचित समुदायों के बीच उनकी असाधारण स्वीकार्यता थी।

दिलचस्प बात यह है कि वे स्वयं जन्मना दलित नहीं थे, लेकिन दलित और आंबेडकरवादी संगठनों ने उन्हें शूद्राचार्य और दलित रत्न जैसे सम्मानों से नवाजा। यह सम्मान किसी जातिगत पहचान के कारण नहीं, बल्कि उनके विचारों और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण मिला था।

मुद्राराक्षस का व्यक्तित्व हमेशा बहसों और विवादों के केंद्र में रहा। उन्होंने साहित्य और समाज में स्थापित महानताओं को चुनौती देने का साहस दिखाया। अज्ञेय, दिनकर, धर्मवीर भारती और नामवर सिंह जैसे बड़े नामों से उनकी वैचारिक मुठभेड़ें अक्सर चर्चा में रही। वे किसी भी तरह की बौद्धिक या सांस्कृतिक सत्ता के सामने झुकने को तैयार नहीं थे।

उनकी रचनात्मक दुनिया भी बेहद व्यापक थी। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, व्यंग्य, इतिहास, धर्म और समाजशास्त्र हर क्षेत्र से जुड़ी उनकी रचनाएं हैं। दंड-विधान, प्रपंचतंत्र, नारकीय, अर्धवृत्त जैसे उपन्यास हों या तेंदुआ, योअर्स फेथफुली और गुफाएं जैसे नाटक, हर जगह उनका अलग और बेबाक दृष्टिकोण दिखाई देता है।

उनके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमें केवल साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि सामाजिक बेचैनी भी मौजूद रहती थी। वे उन सवालों को उठाते थे जिन्हें मुख्यधारा का समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। उनके लिए साहित्य मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का औजार था।

लंबी बीमारी के बाद जब जून 2016 में उनका निधन हुआ तो हिंदी साहित्य ने केवल एक लेखक नहीं खोया था। उसने एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी को खोया था जो आखिरी समय तक सवाल पूछता रहा, आवाज उठाता रहा और समाज के कमजोर वर्गों के पक्ष में खड़ा रहा।

–आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम

[ad_2]

Related Articles

Latest News