बांग्लादेश चुनावों में 1971 की यादों का असर, वोटरों की सोच पर दिखा इतिहास का प्रभाव : र‍िपोर्ट


ढाका, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। बांग्लादेश के फरवरी के चुनावों ने दिखाया कि कैसे राजनीतिक दल ऐतिहासिक यादों का इस्तेमाल करके लोगों की सोच और वोट देने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से गहरा जुड़ाव रखने वाले वोटरों ने उन पार्टियों को ज्यादा पसंद किया, जो उस आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ाने की बात करती हैं। वहीं, उन्होंने उन पार्टियों को नकार दिया, जिनका जुड़ाव उस समय “आजादी के विरोधी” माने जाने वाले लोगों से जोड़ा जाता है।

बांग्लादेश के प्रमुख अखबार ‘प्रथम आलो’ के एक संपादकीय के अनुसार, 2026 के संसदीय चुनावों से पहले नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपने प्रचार में 1971 के मुक्ति संग्राम का जि‍क्र बढ़ा दिया और जमात-ए-इस्लामी (जेआई) की उस समय की विवादित भूमिका पर ध्यान दिलाया।

रिपोर्ट में कहा गया, “ऐतिहासिक रूप से बीएनपी ने कई चुनावों में जेई के साथ गठबंधन किया था और दोनों ने मिलकर सरकारें भी बनाई थीं, हालांकि जेआई ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। लेकिन इस चुनाव में अवामी लीग के न होने से जेई, बीएनपी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गया, जिससे बीएनपी ने चुनावी फायदा लेने के लिए इतिहास को नए तरीके से पेश किया।”

बीएनपी के वरिष्ठ नेताओं ने भी रैलियों में जेआई की भूमिका पर सवाल उठाए। बीएनपी के नेता और प्रधानमंत्री (जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है) तारिक रहमान ने 22 जनवरी को सिलहट की एक रैली में कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान कुछ लोगों ने देश के खिलाफ भी रुख अपनाया था और इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता।

28 जनवरी को बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने भी जेआई की आलोचना करते हुए कहा, “इस पार्टी ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम का विरोध किया था और देश की आजादी में विश्वास नहीं रखा था। क्या ऐसे लोगों पर देश चलाने का भरोसा किया जा सकता है?”

अखबार ने लिखा कि बीएनपी नेताओं ने अपनी आलोचना को मुक्ति संग्राम और स्वतंत्रता सेनानियों की रक्षा के रूप में पेश किया, लेकिन यह भी माना कि पहले बीएनपी ने जेआई के साथ गठबंधन सिर्फ राजनीतिक जरूरतों के लिए किया था, न कि उनके इतिहास का समर्थन करने के लिए।

विश्लेषकों के मुताबिक, यह रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि वे उन वोटरों को अपने पक्ष में ला सकें जो मुक्ति संग्राम की विरासत को लेकर संवेदनशील हैं और जो पहले अवामी लीग की तरफ झुकाव रख सकते थे। जेआई के इतिहास पर जोर देकर बीएनपी ने खुद को मुक्ति संग्राम की रक्षा करने वाली पार्टी के रूप में पेश किया और जेआई को उसके उलट दिखाया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चुनाव के नतीजों से पता चला कि 12 फरवरी के चुनाव में मुक्ति संग्राम से भावनात्मक रूप से जुड़े वोटरों ने बीएपी को वोट दिया। यह सिर्फ उनके चुनावी वादों की वजह से नहीं था, बल्कि इस डर की वजह से भी था कि अगर जेआई सत्ता में आई, तो 1971 की आजादी की विरासत और मूल्य कमजोर पड़ सकते हैं।

–आईएएनएस

एवाई/डीकेपी


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