दिल्ली हाईकोर्ट बाल आत्मसमर्पण मामलों में सीडब्ल्यूसी द्वारा स्थानीय भाषा में संचार पर विचार करने को तैयार


नई दिल्ली, 17 नवंबर (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय इस प्रश्न पर विचार करने के लिए तैयार है कि क्या यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष बच्चों के आत्मसमर्पण से संबंधित प्रावधानों के बारे में उनकी स्थानीय या बोली जाने वाली भाषा में सूचित किया जाना चाहिए।

नाबालिग की सहमति से शादी से जुड़े पॉक्‍सो मामले में जमानत याचिका की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने इस मामले में अधिवक्ता कुमुद लता दास को न्याय मित्र नियुक्त किया है।

मामले में आरोपी को पहले जमानत मिल गई थी, उस पर नाबालिग का अपहरण करने और उससे शादी करने का आरोप था, जिसके परिणामस्वरूप एक बच्चा पैदा हुआ और बाद में उसने गोद लेने के लिए आत्मसमर्पण कर दिया।

अदालत ने यह सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया कि पीड़िता और उसकी मां, जो अंग्रेजी में साक्षर नहीं हैं, सीडब्ल्यूसी द्वारा की गई कार्यवाही को समझें।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि सीडब्ल्यूसी के रिकॉर्ड, जिसमें आत्मसमर्पण के लिए आवेदन भी शामिल है, अंग्रेजी में थे, इससे उन लोगों के लिए भाषा बाधा पैदा हो रही थी, जो भाषा में पारंगत नहीं थे।

पीड़िता की अशिक्षा और केवल उर्दू समझने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने कार्यवाही को उनकी स्थानीय भाषा में समझाने की आवश्यकता पर बल दिया।

अदालत ने सीडब्ल्यूसी की संवेदनशीलता और संचार दृष्टिकोण पर चिंता जताई और कहा कि उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़िता और उसकी मां कार्यवाही को समझें।

नियुक्त न्याय मित्र प्रमुख मुद्दों का समाधान करेंगे, इसमें पीड़ितों को बच्चे के आत्मसमर्पण प्रावधानों के बारे में सूचित करने में सीडब्ल्यूसी द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं, माता-पिता दोनों के जीवित होने पर कानूनी अभिभावक का निर्धारण करना और क्या पीड़ित को एक निर्दिष्ट अवधि के बाद बच्चे को गोद लेने के बारे में सूचित किया गया था।

मामले की अगली सुनवाई 22 नवंबर को होनी है।

–आईएएनएस

सीबीटी


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