ऊर्जा संकट को चीन ने बनाया फायदे का सौदा, भारत ने 'पड़ोसी पहले' नीति के तहत की मदद : र‍िपोर्ट

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नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। मध्य पूर्व के संघर्ष के चलते होर्मुज स्‍ट्रेट बंद होने से जो ऊर्जा संकट पैदा हुआ है, उसने यह भी दिखा दिया कि मुश्किल समय में भारत और चीन अपने पड़ोसियों के साथ कैसे अलग-अलग तरीके से पेश आते हैं।

डेली मिरर ऑनलाइन के एक लेख में बताया गया, “जब चीन ऊर्जा देने की बात करता है, जैसे उसने ताइवान के साथ किया, तो उसके साथ एक राजनीतिक शर्त भी जुड़ी होती है। वहीं, जब भारत नेपाल या श्रीलंका को ईंधन देता है, तो वह पहले से बने सरकारी समझौतों के तहत बिना किसी राजनीतिक शर्त या दबाव के देता है।”

लेख के मुताबिक, चीन की प्रतिक्रिया तेज जरूर थी, लेकिन अपने फायदे के लिए थी।

चीन ने नए ईंधन निर्यात सौदों को रोकने का आदेश दिया और पहले से तय सप्लाई को भी रद्द करने की कोशिश की, क्योंकि मध्य पूर्व के युद्ध के कारण वैश्विक ईंधन बाजार पहले से ही दबाव में था। इसका असर यह हुआ कि ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देश, जो चीन से ईंधन पर निर्भर थे, अचानक मुश्किल में पड़ गए।

लेख के अनुसार, चीन के पास कच्चे तेल का बड़ा भंडार और मजबूत नवीकरणीय ऊर्जा सेक्टर है, इसलिए वह इस संकट को अपने पड़ोसियों से बेहतर झेल सकता है, लेकिन बीजिंग ने सोचा कि अगर पूरे क्षेत्र में कमी रहती है तो यह उसके लिए ज्यादा फायदेमंद होगा।

लेख में यह भी बताया गया है कि चीन ने इस मौके का फायदा उठाकर अपने पड़ोसियों पर दबाव बनाने की कोशिश की। उसने ताइवान को तेल देने की पेशकश की, लेकिन बदले में शांतिपूर्ण तरीके से चीन के साथ एकीकरण की शर्त रखी। ताइवान ने इस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया। वहीं, इसी हालात में भारत का रवैया काफी अलग रहा।

भारत ने पीछे हटने के बजाय श्रीलंका को करीब 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजा, जिससे उसकी तत्काल जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा हो गया।

नेपाल और भूटान, जो पूरी तरह भारत पर निर्भर हैं, उन्हें ईंधन की सप्लाई बिना रुके मिलती रही।

इसी तरह बांग्लादेश को भी अतिरिक्त डीजल भेजा गया और आगे भी पाइपलाइन के जरिए सप्लाई जारी रखने का भरोसा दिया गया।

लेख में कहा गया, “ये सिर्फ दिखावे के लिए उठाए गए कदम नहीं थे, बल्कि ये भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति का हिस्सा हैं, जो अब असली संकट के समय में भी सही साबित हो रही है।”

–आईएएनएस

एवाई/

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