बलूचिस्तान कोयला खदान हादसा: पाकिस्तान के खनन उद्योग के खतरों को एक बार फिर किया उजागर, 34 मजदूरों की मौत

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इस्लामाबाद, 2 अगस्त (आईएएनएस)। पाकिस्तान के बलूचिस्तान में क्वेटा के स्पिन करेज इलाके में हुई हालिया कोयला खदान त्रासदी ने एक बार फिर देश के खनन उद्योग के खतरों को उजागर कर दिया है। इस हादसे में 34 मजदूरों की मौत हो गई।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार सुबह मजदूर जमीन से कई हजार फीट नीचे रोजाना खनन कार्य कर रहे थे, तभी अचानक मीथेन गैस में जोरदार विस्फोट हुआ। विस्फोट के बाद खदान का एक हिस्सा ढह गया और दर्जनों मजदूर मलबे में फंस गए।

खबर के मुताबिक मृतकों में से अधिकांश मजदूर खैबर पख्तूनख्वा के शांगला जिले के रहने वाले थे। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में आफताब हुसैन ने लिखा कि मृतकों में 22 लोग अकेले शांगला जिले के मियां कल्ले पीराबाद गांव के थे। बाकी पीड़ित आसपास के गांवों के थे। ज्यादातर मृतक एक-दूसरे के रिश्तेदार या एक ही कुनबे और बिरादरी के थे। कई घरों में एक से ज्यादा सदस्यों की मौत हुई है, जिससे कई बच्चे अनाथ और महिलाएं विधवा हो गई हैं।

हादसे के सभी शिकार अपने परिवारों का पालन-पोषण करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर शांगला से बलूचिस्तान में काम करने आए थे। रिपोर्ट में कहा गया कि दशकों से शांगला पाकिस्तान के आर्थिक रूप से पिछड़े जिलों में से एक रहा है। यहां औद्योगिक विकास कम है, रोजगार के अवसर न के बराबर हैं, कृषि उत्पादन भी कम है और बेरोजगारी व्यापक है। इसी वजह से हजारों युवा बलूचिस्तान, सिंध और पंजाब की कोयला खदानों में काम करने को मजबूर हैं।

स्थानीय अनुमानों के अनुसार शांगला की लगभग 65 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोयला खनन पर निर्भर है। अब यह सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आ रहा काम बन गया है।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा कि पिछले कई दशकों में बलूचिस्तान में हुई ऐसी ही कोयला खदान दुर्घटनाओं में शांगला के सैकड़ों मजदूरों की जान जा चुकी है, जबकि हजारों लोग स्थायी रूप से अपंग हो चुके हैं। हुसैन ने लिखा, “कई बार एक ही हफ्ते में शांगला में पांच-छह मजदूरों के शव पहुंचे हैं।”

सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के अनुसार शांगला के मजदूर आज भी बुनियादी कानूनी सुरक्षा के बिना काम कर रहे हैं। ज्यादातर मजदूर सरकारी अधिकारियों के पास पंजीकृत नहीं हैं और उन्हें सामाजिक सुरक्षा, ईओबीआई, स्वास्थ्य बीमा या जीवन बीमा जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। कई लोग ठेकेदारों और पट्टाधारकों के जरिए काम करते हैं, जिसके चलते घातक दुर्घटना होने पर पीड़ित परिवारों को बहुत कम या बिल्कुल भी मुआवजा नहीं मिल पाता।

–आईएएनएस

डीएससी

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