बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव पर राज्यसभा में जताई चिंता, निर्णायक कदम उठाने की मांग


नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस)। बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का उल्लेख मंगलवार को राज्यसभा में किया गया। राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार, 2022 में भारत में लगभग 13,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जो 2013 की तुलना में लगभग दोगुनी संख्या है।

यही नहीं आज भारत में कुल आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी विद्यार्थियों की है। उन्होंने बताया कि 4 फरवरी को गाजियाबाद में 12, 14 और 16 वर्ष की तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि यह घटना ऑनलाइन खेलों की लत से जुड़ी थी।

उन्होंने कहा कि हम सब जानते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स दुनिया भर में अरबों लोगों को जोड़ते हैं। यह लोगों की आवाज को आगे बढ़ाने का काम भी करते हैं। ये प्लेटफार्म जानकारी को अधिक लोकतांत्रिक बनाते हैं। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि इसकी एक डार्क साइड भी है।

उन्होंने कहा कि आज भारत में सोशल मीडिया प्लेटफार्म के उपयोगकर्ताओं में लगभग एक-तिहाई किशोर हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 2010 के बाद किशोरों में अवसाद और आत्महत्या के मामलों में तेज वृद्धि देखी गई, ठीक उसी समय जब एक कंपनी फेसबुक ने युवाओं को आक्रामक रूप से अपने मंच की ओर आकर्षित करना शुरू किया।

देवड़ा ने कहा कि हम अक्सर बच्चों को व्यस्त रखने या उनका ध्यान भटकाने के नाम पर बहुत कम उम्र में ही उनके हाथों में टैबलेट और मोबाइल फोन दे देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 27 प्रतिशत किशोरों में सोशल मीडिया प्लेटफार्म की लत के लक्षण दिखते हैं। इसके साथ-साथ पढ़ाई में गिरावट, चिंता और आत्मविश्वास की कमी भी देखी जा रही है।

उन्होंने सदन में कहा कि एक सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में लगभग 33 प्रतिशत बच्चे साइबर उत्पीड़न का सामना करते हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, किशोरों से जुड़े हिंसक अपराधों की हिस्सेदारी 2016 में 32 प्रतिशत थी, जो 2022 तक बढ़कर लगभग 50 फीसदी के करीब पहुंच गई।

सांसद ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में एक मां और उसकी बेटी ने मेटा नामक कंपनी के विरुद्ध मुकदमा दायर किया है, जो इंस्टाग्राम और फेसबुक की मूल कंपनी है। आरोप है कि इन मंचों के एल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि वे युवाओं को लत की ओर धकेलते हैं और उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं।

उन्होंने बताया कि आज फ्रांस ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और विद्यालयों में मोबाइल फोन पर भी रोक लगाई है। ऑस्ट्रेलिया ने इसे 16 वर्ष से कम आयु तक सीमित किया है। हाल ही में इंडोनेशिया ने भी किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई है और ऐसा करने वाला वह एशिया का पहला देश बन गया है। स्पेन और जर्मनी भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित एआई इंपैक्ट शिखर सम्मेलन में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी आग्रह किया कि 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया की पहुंच सीमित करने पर विचार किया जाए। भारत में पहले से ही डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढांचा मौजूद है, जिसमें 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अभिभावकों की सत्यापित सहमति जैसे प्रावधान हैं। लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर सोशल मीडिया कंपनियों को और अधिक जवाबदेह बनाना होगा।

देवड़ा ने कहा कि यह उत्साहजनक है कि भारत के कई राज्य जैसे गोवा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक आदि इस विषय पर चर्चा शुरू कर चुके हैं। हमें विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को भी शामिल करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका माता-पिता की है। बच्चों को सोशल मीडिया तक पहुंच देने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, उनके उपयोग की निगरानी करनी चाहिए और उनसे खुलकर संवाद करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज हम गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। एक छोटे बच्चे के पिता के रूप में, मैं इस सदन और सरकार से आग्रह करता हूं कि हम शीघ्र और निर्णायक कदम उठाएं ताकि हमारे युवाओं का भविष्य सुरक्षित रह सके।

–आईएएनएस

जीसीबी/एएस


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