आरएसएस पर कैलाश विजयवर्गीय की टिप्पणी का अखाड़ा परिषद ने किया समर्थन, कहा- आत्ममंथन की जरूरत


हरिद्वार, 28 जून (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की टिप्पणी का अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी और परिषद के मीडिया कोऑर्डिनेटर करौली शंकर महाराज ने समर्थन किया। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े संगठन को अनुशासन बनाए रखने और कार्यप्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर आत्ममंथन और सुधार की आवश्यकता होती है।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि जब किसी परिवार या संगठन का विस्तार होता है तो उसके साथ अच्छाइयों के साथ-साथ कुछ बुराइयां भी आ जाती हैं। साल 2014 के बाद जब भाजपा की सरकार बनी, तब संघ के अनेक स्वयंसेवक भी विभिन्न सरकारी जिम्मेदारियों और व्यवस्थाओं से जुड़े। ऐसे में समय के साथ कुछ चुनौतियां और कमियां सामने आना स्वाभाविक है। संघ के पुराने कार्यकर्ताओं ने त्याग, तपस्या और नैतिक मूल्यों के आधार पर अपना जीवन जिया, लेकिन वर्तमान पीढ़ी भौतिकवादी परिवेश में पली-बढ़ी है, जिसके कारण कुछ कुरीतियां भी देखने को मिल रही हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने जो बात कही है, उसका उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं, बल्कि संगठन के हित में सुधार की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करना है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि संघ नेतृत्व इस प्रकार की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कार्रवाई करेगा। यदि किसी प्रांत प्रचारक, जिला प्रचारक या अन्य कार्यकर्ता के खिलाफ शिकायत आती है तो उस पर तत्काल निर्णय लिया जाना चाहिए। किसी भी मामले को लंबे समय तक लंबित रखना उचित नहीं होता, क्योंकि छोटी समस्या समय के साथ बड़ी बन जाती है। उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यहां नए प्रांत प्रचारक के आने के बाद कई स्तरों पर सकारात्मक सुधार देखने को मिले हैं। समाज के हर क्षेत्र में कुछ अच्छी और कुछ बुरी प्रवृत्तियां होती हैं, इसलिए संगठन के भीतर भी समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है।

महंत रवींद्र पुरी ने कहा कि साधु समाज में एक कहावत प्रचलित है, ‘ज्यादा जोगी मठ उजाड़।’ मतलब कि जब किसी संगठन का अत्यधिक विस्तार होता है और विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग उससे जुड़ते हैं, तब बेहतर समन्वय और अनुशासन बनाए रखने के लिए सक्षम नेतृत्व की आवश्यकता होती है। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने चाहिए ताकि संगठन की छवि और कार्यशैली दोनों मजबूत बनी रहें। आज सूचना का युग है और छोटी-सी घटना भी कुछ ही समय में पूरी दुनिया तक पहुंच जाती है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए ईमानदारी, नैतिकता और चरित्र की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है। यदि संघ का कोई स्वयंसेवक गलत कार्य करता है तो उसका असर पूरे संगठन की छवि पर पड़ता है। संघ ने आपदा राहत, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय संकट के समय उल्लेखनीय योगदान दिया है, इसलिए संगठन की सकारात्मक छवि को बनाए रखने के लिए अनुशासन और आचरण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

वहीं, अखाड़ा परिषद के मीडिया कोऑर्डिनेटर करौली शंकर महाराज ने भी कैलाश विजयवर्गीय की टिप्पणी का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह बयान किसी द्वेष या विरोध की भावना से नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में सुधार की भावना से दिया गया है। जब घर-परिवार में कोई कमी आती है तो सबसे पहले परिवार के लोग ही उसे सामने लाते हैं और सुधार का प्रयास करते हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने भी उसी पारिवारिक भावना से यह बात कही है।

उन्होंने आगे कहा कि हर बड़े संगठन में समय-समय पर चिंतन और मंथन की आवश्यकता होती है। उन्होंने इसकी तुलना एक विशाल वटवृक्ष से करते हुए कहा कि यदि बड़े वृक्ष के भीतर कहीं खोखलापन आने लगे तो उसे मजबूत करने के लिए समय रहते सुधारात्मक कदम उठाने पड़ते हैं। संघ की विचारधारा भारतीय संस्कृति और हिंदू समाज से जुड़ी विचारधारा है। ऐसे में यदि संगठन के भीतर कहीं कोई विकार आता है तो उस पर खुलकर विचार होना चाहिए और आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए। संघ का शीर्ष नेतृत्व इस दिशा में पूरी गंभीरता से काम करेगा और आने वाले समय में आवश्यक सुधार स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे।

–आईएएनएस

पीएसके/डीकेपी


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