श्रुति से स्वरलिपि तक… पंडित भातखंडे ने कैसे बदल दी हिंदुस्तानी संगीत की दुनिया

[ad_1]

202608093897196

नई दिल्ली, 9 अगस्त (आईएएनएस)। आज अगर कोई विद्यार्थी किताब खोलकर किसी राग के बारे में पढ़ सकता है, उसके स्वर समझ सकता है और लिखी हुई बंदिशों की मदद से संगीत सीख सकता है तो इसके पीछे महान संगीत मनीषी पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का योगदान है। उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को सिर्फ नई दिशा ही नहीं दी, बल्कि उसे सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का ऐसा रास्ता बनाया, जिसका महत्व आज भी बना हुआ है।

दरअसल, प्राचीन भारत में ज्ञान को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम श्रुति परंपरा थी। यानी गुरु बोलते थे, शिष्य सुनते थे और फिर उसे याद रखते हुए आगे बढ़ाते थे। वेदों और पुराणों का ज्ञान भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी तरह आगे पहुंचा। संगीत की दुनिया भी लंबे समय तक इसी परंपरा पर टिकी रही। गुरु अपने शिष्यों को राग, आलाप, तान और बंदिशें सुनाकर सिखाते थे।

लेकिन सोचिए, अगर संगीत सिर्फ सुनकर ही सीखा और सहेजा जाता रहता तो क्या हर चीज आने वाली पीढ़ियों तक सही रूप में पहुंच पाती? शायद नहीं। यही वह बड़ी चुनौती थी, जिसे पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने पहचाना। उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत को एक व्यवस्थित, वैज्ञानिक और लिखित रूप देने का बीड़ा उठाया।

पंडित भातखंडे का जन्म 10 अगस्त 1860 को मुंबई के वालकेश्वर में हुआ था। उनके परिवार में पढ़ाई-लिखाई और संगीत का अच्छा माहौल था। बचपन से ही उनकी संगीत में गहरी रुचि थी। कहा जाता है कि वे अपनी मां से सुने गीतों को बहुत आसानी से उसी तरह दोहरा देते थे। करीब 15 साल की उम्र में उन्होंने सितार सीखना शुरू किया और धीरे-धीरे संगीत उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून बन गया।

हालांकि उन्होंने शुरुआत में संगीत को अपना पेशा नहीं बनाया। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और कानून की पढ़ाई करने के बाद कुछ समय तक आपराधिक मामलों के वकील के रूप में प्रैक्टिस भी की। लेकिन संगीत उनके दिल से कभी दूर नहीं हुआ। वे मुंबई की गायन मंडली से जुड़े और खयाल तथा ध्रुपद जैसी शास्त्रीय संगीत की विधाओं को गहराई से समझने लगे।

उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जिसने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। पत्नी और फिर बेटी के निधन ने उन्हें गहरा सदमा पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने अपनी कानूनी प्रैक्टिस छोड़ दी और खुद को पूरी तरह संगीत के लिए समर्पित कर दिया।

पंडित भातखंडे भारत के अलग-अलग हिस्सों में घूमे, बड़े-बड़े उस्तादों और पंडितों से मिले और संगीत की बारीकियों को सीखा। उन्होंने बड़ौदा, ग्वालियर, रामपुर समेत कई संगीत केंद्रों की यात्राएं कीं। साथ ही नाट्यशास्त्र और संगीत रत्नाकर जैसे प्राचीन ग्रंथों का भी गहराई से अध्ययन किया।

साल 1904 में उनकी यात्रा उन्हें दक्षिण भारत भी ले गई। वहां उन्होंने कर्नाटक संगीत की परंपरा को करीब से समझा और कई महत्वपूर्ण संगीत ग्रंथों का अध्ययन किया। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत परंपराओं के अध्ययन के बाद उन्होंने हिंदुस्तानी रागों को व्यवस्थित करने की दिशा में बड़ा काम किया।

उनका सबसे चर्चित योगदान है दस थाट प्रणाली (हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों को व्यवस्थित करने की पद्धति)। उस दौर में रागों का वर्गीकरण पुराने राग-रागिनी और पुत्र जैसे तरीकों से किया जाता था। पंडित भातखंडे ने इसे एक व्यवस्थित ढांचे में बांटने की कोशिश की और रागों को दस प्रमुख थाटों में वर्गीकृत किया। आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई में भातखंडे की थाट प्रणाली बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इतना ही नहीं, उन्होंने संगीत को लिखित रूप देने के लिए एक स्वरलिपि प्रणाली भी विकसित की। अब रागों के स्वर, बंदिशें, आलाप और दूसरी बारीकियां लिखी जाने लगीं। इससे संगीत को सीखना और सिखाना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान हो गया। बाद में कई संगीतज्ञों ने इस प्रणाली में अपने स्तर पर सुधार किए, लेकिन संगीत को व्यवस्थित ढंग से लिखने का रास्ता भातखंडे ने ही मजबूत किया।

उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं। उनकी ‘हिंदुस्तानी संगीत पद्धति क्रमिक पुस्तक मालिका’ आज भी संगीत के विद्यार्थियों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। इन पुस्तकों के जरिए उन्होंने संगीत की जटिल बातों को आसान और व्यवस्थित रूप में समझाने की कोशिश की।

पंडित भातखंडे का योगदान सिर्फ किताबों और सिद्धांतों तक सीमित नहीं था। उन्होंने संगीत शिक्षा के लिए संस्थानों की स्थापना और उन्हें व्यवस्थित करने में भी बड़ी भूमिका निभाई। लखनऊ में स्थापित मैरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक बाद में उनके नाम पर भातखंडे संगीत संस्थान के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों की परंपरा को भी बढ़ावा दिया, जहां अलग-अलग घरानों और संगीत परंपराओं के कलाकार एक मंच पर आ सके।

19 सितंबर 1936 को पंडित विष्णु नारायण भातखंडे इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनका काम आज भी जिंदा है। उनकी थाट प्रणाली, स्वरलिपि और संगीत शिक्षा की सोच ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक नई पहचान दी।

–आईएएनएस

पीआईएम/वीसी

[ad_2]

Related Articles

Latest News