मुंबई, 6 अगस्त (आईएएनएस)। गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल 1937 को लाहौर से 30 किलोमीटर दूर शेखूपुरा (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन की इस विभीषिका के बाद गुलशन का पालन-पोषण जयपुर में उनकी बड़ी बहन ने किया। इसके बाद वे दिल्ली आ गए, जहां उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की और इसी दौरान कविताएं लिखने की शुरुआत की।
युवा गुलशन की आंखों में फिल्मों का सपना था। शुरुआत में उन्होंने रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन किया और उन्हें कोटा (राजस्थान) में पोस्टिंग मिली, लेकिन जब वे वहां पहुंचे तो वह पद भर चुका था। किस्मत उन्हें 1955 में मुंबई ले आई, जहां उन्हें रेलवे क्लर्क की नौकरी मिल गई। उनका पूरा नाम गुलशन कुमार मेहता था, जो बाद में गुलशन बावरा के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मुंबई के उन संघर्षपूर्ण शुरुआती दिनों में गुलशन बावरा अपना कमरा एक अन्य उभरते हुए कलाकार के साथ साझा करते थे, जो आगे चलकर स्वयं एक महान गीतकार गुलजार बने। दफ्तर के बाद वे स्टूडियो के चक्कर लगाते थे और इसी लगन ने उन्हें संगीतकार कल्याणजी से मिलवाया। कल्याणजी ने उन्हें 1959 की फिल्म ‘चंद्रसेना’ में अपना पहला ब्रेक दिया, लेकिन उनके जीवन और पहचान का सबसे बड़ा मोड़ उसी वर्ष फिल्म ‘सट्टा बाजार’ के दौरान आया।
गुलशन अक्सर बहुत ही रंग-बिरंगे और चटक शर्ट पहनते थे और उनके बाल बिखरे रहते थे। उनकी इस अतरंगी वेशभूषा को देखकर फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल ने मजाकिया अंदाज में कहा कि यह लड़का तो बिल्कुल ‘बावरा’ दिखता है। यह नाम गुलशन को इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए अपना लिया।
गुलशन बावरा के लिखे गीतों में जहां एक ओर आम आदमी की भाषा का सीधापन था, वहीं दूसरी ओर गहरी दार्शनिकता भी थी। अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की 1967 में आई फिल्म ‘उपकार’ के गीत ‘मेरे देश की धरती’ की रचना का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। मनोज कुमार ने एक बार गुलशन बावरा को एक तीर्थ स्थान से लौटते वक्त कुछ पंक्तियां गुनगुनाते हुए सुना था। सालों बाद जब ‘उपकार’ बन रही थी, तो मनोज कुमार ने उनसे उसी धुन और भाव पर गीत लिखने की जिद की, जिसने एक ऐतिहासिक राष्ट्रगीत का रूप ले लिया।
अपने 42 साल के लंबे और सुनहरे करियर में गुलशन बावरा ने गुणवत्ता को हमेशा मात्रा से ऊपर रखा और केवल 240 के करीब गीत लिखे। उपकार फिल्म के ‘मेरे देश की धरती’ के लिए उन्हें 1968 में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर मिला, वहीं जंजीर के ‘यारी है ईमान मेरी’ पर 1974 में यही सम्मान मिला। ‘कसमे वादे निभाएंगे हम’ चार्टबस्टर रहा और ‘प्यार हमें किस मोड़ पे’ युवाओं का एंथम बना। ‘चांदी की दीवार न तोड़ी’ उनकी एक दार्शनिक और मार्मिक रचना है।
1975 के बाद गुलशन बावरा और संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) की जुगलबंदी ने कमाल कर दिया। दोनों स्वभाव से बेहद मस्तमौला थे और उनकी दोस्ती संगीत कक्ष से लेकर निजी जीवन तक गहरी थी।
उन्होंने ‘जंजीर’, ‘उपकार’, ‘पवित्र पापी’, ‘लफंगे’, और पंजाबी फिल्मों जैसे ‘जीजा जी’ और ‘नौकर बीवी दा’ सहित कुल 21 फिल्मों में अभिनय किया। फिल्म ‘जंजीर’ के मशहूर गीत ‘दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए’ में वे खुद स्क्रीन पर हारमोनियम बजाते हुए नजर आए थे।
7 अगस्त 2009 को 72 वर्ष की आयु में, पाली हिल (मुंबई) स्थित अपने निवास पर हृदय गति रुकने से इस महान कलाकार का निधन हो गया।
–आईएएनएस
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