स्पेन से सीरिया तक : 21वीं सदी के प्रवासी संकट से बदलती दुनिया, ऐलन कुर्दी याद हैं?


नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। स्पेन में मात्र 24 घंटे में 60 हजार से ज्यादा प्रवासी प्रवेश कर गए। चारों ओर हाहाकार मच गया। स्वायत्त क्षेत्र स्यूटा दंग रह गया। भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर के रास्ते उत्तरी अफ्रीका से आने वाली छोटी-छोटी नौकाएं लगातार स्पेन के तटों तक पहुंचती रहीं। इससे सीमा सुरक्षा, शरणार्थी नीति, आवास, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। लेकिन यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। इसकी जड़ें 2000 के दशक की शुरुआत में दिखाई देने लगी थीं।

यूरोप और अफ्रीका को दूर रखकर भी जोड़ता है जिब्राल्टर स्ट्रेट! यही मोरक्को और स्पेन के बीच मौजूद है। लंबे समय से अफ्रीकी प्रवासी इसे पार कर स्पेन में प्रवेश करते रहे। मोरक्को, अल्जीरिया, माली, सेनेगल, मॉरिटानिया और अन्य अफ्रीकी देशों के हजारों लोग बेहतर जीवन, रोजगार और सुरक्षा की उम्मीद में स्पेन पहुंचने लगे।

साल 2006 में स्थिति तब गंभीर हुई, जब हजारों अफ्रीकी प्रवासी कैनरी द्वीप समूह पहुंच गए। छोटी नौकाओं में समुद्र पार करने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की जान भी गई। इसे ‘कायुकॉस संकट’ के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, इसके बाद स्पेन ने सीमा सुरक्षा मजबूत की, अफ्रीकी देशों के साथ समझौते किए और समुद्री निगरानी बढ़ाई। इसके बावजूद प्रवास का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

21वीं सदी का कुख्यात प्रवासी संकट 2015 में सामने आया। कौन भूल सकता है समुद्र किनारे औंधे मुंह मौत की नींद सोते 3 साल के ऐलन कुर्दी को। उस तस्वीर को जिसने भी देखा उसका कलेजा फट गया। आईओएम यानी इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर इमिग्रेशन (अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन) के अनुसार, सीरिया में गृहयुद्ध, इराक में हिंसा और अफगानिस्तान में अस्थिरता के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़कर यूरोप की ओर निकल पड़े।

तुर्की से ग्रीस और फिर बाल्कन मार्ग के जरिए जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया और अन्य यूरोपीय देशों तक शरणार्थियों का विशाल प्रवाह पहुंचा। उस समय जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया, जबकि कई अन्य देशों ने सीमाएं कड़ी कर दीं। इसी संकट ने यूरोप में आव्रजन नीति को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध ने आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक को जन्म दिया। लाखों लोग देश के भीतर विस्थापित हुए, जबकि 60 लाख से अधिक लोगों ने तुर्की, लेबनान, जॉर्डन और यूरोप में शरण ली।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सीरिया का संकट आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और लाखों लोग अब भी राहत शिविरों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। 2017 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा के बाद सात लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंच गए। कॉक्स बाजार दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर बन गया। वर्षों बाद भी अधिकांश रोहिंग्या अपने घर नहीं लौट सके हैं।

दक्षिण अमेरिका में वेनेजुएला की आर्थिक बदहाली ने भी अभूतपूर्व प्रवास को जन्म दिया। महंगाई, बेरोजगारी और खाद्य संकट के कारण 70 लाख से अधिक लोग देश छोड़कर कोलंबिया, ब्राजील, पेरू, इक्वाडोर और अन्य देशों में बस गए। इसे लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रवासी संकट माना जाता है।

2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद हजारों अफगान नागरिकों ने देश छोड़ने की कोशिश की। काबुल हवाई अड्डे की तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखीं, जहां लोग किसी भी तरह विमान में सवार होकर सुरक्षित देश पहुंचना चाहते थे। इसके बाद लाखों अफगान पाकिस्तान, ईरान और अन्य देशों में शरण लेने पहुंचे।

फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कुछ ही महीनों में लाखों यूक्रेनी नागरिक पड़ोसी देशों में पहुंच गए। पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया और जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को अस्थायी संरक्षण दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में यह सबसे तेज़ गति से हुआ जन-पलायन माना गया।

21वीं सदी के प्रवासी संकट केवल युद्ध तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। जैसे गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और हिंसा, आर्थिक संकट और बेरोजगारी, जलवायु परिवर्तन, सूखे-बाढ़ से खाद्य असुरक्षा आदि।

–आईएएनएस

केआर/


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