कोलकाता, 14 जुलाई (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल सरकार ने मंगलवार को घोषणा की कि वर्ष 2011 से 2026 तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान हुए विभिन्न कथित संस्थागत भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया है।
इस आयोग का नेतृत्व कलकत्ता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु करेंगे।
नबान्ना स्थित राज्य सचिवालय से जारी अधिसूचना के अनुसार, वर्ष 2011 से मई 2026 तक शिक्षा, खाद्य एवं आपूर्ति, राहत एवं आपदा प्रबंधन, नगर निकाय एवं पंचायत क्षेत्रों, आवास और मत्स्य पालन सहित विभिन्न राज्य सरकारी विभागों के कामकाज में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की जाएगी।
राज्य सचिवालय के एक सूत्र ने बताया कि यह न्यायिक आयोग पुलिस की कथित ज्यादतियों, जैसे अवैध हिरासत में रखने और निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने जैसे मामलों की भी जांच करेगा।
न्यायमूर्ति बसु (सेवानिवृत्त) आयोग के प्रमुख होंगे, जबकि आयोग की जांच एक वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी की निगरानी में की जाएगी।
आयोग का प्रशासनिक काम किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी या पश्चिम बंगाल सिविल सेवा (डब्ल्यूबीसीएस) के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा संभाला जाएगा।
आयोग के कामकाज के तकनीकी पहलुओं को पश्चिम बंगाल राजस्व सेवा (डब्ल्यूबीआरएस) का एक अधिकारी संभालेगा। राज्य सचिवालय के सूत्र ने बताया कि आवश्यकता पड़ने पर आयोग में अतिरिक्त सदस्यों को भी शामिल किया जा सकता है।
आयोग यह भी सुझाव देगा कि भ्रष्टाचार के इन मामलों में कथित रूप से लूटी गई धनराशि को दोषियों से किस प्रकार वापस वसूला जा सकता है।
जांच के उद्देश्य से आयोग को किसी भी व्यक्ति को पूछताछ के लिए तलब करने का अधिकार होगा।
राज्य सचिवालय के सूत्र ने कहा, “यदि आयोग को लगता है कि भ्रष्टाचार हुआ है तो वह संबंधित मामलों में पुलिस को एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश कर सकता है। आयोग जांच की प्रगति से संबंधित रिपोर्ट समय-समय पर राज्य सरकार को सौंपेगा।”
पिछले महीने पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने घोषणा की थी कि राज्य सरकार जल्द ही पूर्व ममता सरकार के दौरान विभिन्न विभागों में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं पर विभागवार श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) जारी करेगी।
दासगुप्ता ने कहा था कि इन श्वेत पत्रों में यह बताया जाएगा कि 2011 से 2026 तक तृणमूल कांग्रेस सरकार के 15 वर्षों के दौरान राज्य पर इतना बड़ा कर्ज क्यों बढ़ा और कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी क्यों हुई।
राज्य के वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि अब नई राज्य सरकार भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्टों को पश्चिम बंगाल विधानसभा के पटल पर रखेगी। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली राज्य सरकार के दौरान इस मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया था।
–आईएएनएस
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