पीएम मोदी का स्वागत करने को इंडोनेशिया बेताब, भारतीय मूल के लेखक भेंट करेंगे खास किताब


जकार्ता/नई दिल्ली, 5 जुलाई (आईएएनएस)। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को इंडो-पैसिफिक मिशन की शुरुआत इंडोनेशिया से करेंगे। 6 जुलाई से 8 जुलाई तक उनका यहां कार्यक्रम है। पीएम को चौथी बार स्वागत करने को जकार्ता तैयार है। मुख्य सड़कों और इमारतों पर इंडोनेशिया-भारत के मजबूत संबंधों की झलक देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम में भारतीय समुदाय से मुलाकात भी शामिल है।

पीएम मोदी का ये दौरा भारतीयों के लिए एक और मायने में खास है। दरअसल, ये गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की इंडोनेशिया यात्रा का शताब्दी वर्ष भी है। 100 साल पहले गुरुदेव डच ईस्ट यानी आज के इंडोनेशिया पधारे थे। उनकी उस ऐतिहासिक यात्रा को एक किताब ‘रवींद्रनाथ टैगोर्स इंडोनेशियन ओडिसी: ए कल्चरल पिलग्रिमेज’ में समेटा गया है और यही किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट की जाएगी।

आईएएनएस से बात करते हुए लेखक अरिंदम मुखर्जी ने बताया, “1927 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तत्कालीन डच ईस्ट इंडीज, यानी आज के इंडोनेशिया का दौरा किया था। वर्ष 2026 उस ऐतिहासिक यात्रा का शताब्दी वर्ष है।”

उन्होंने आगे कहा, “यह एक सुखद संयोग है कि इसी शताब्दी वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इंडोनेशिया की यात्रा पर आ रहे हैं। मैं पिछले दो वर्षों से इस विषय और इस पुस्तक पर काम कर रहा था। खुशी की बात है कि टैगोर की यात्रा के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर यह पुस्तक भी पूरी हो गई है। इसलिए मैं इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट करूंगा।”

विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, रवींद्रनाथ टैगोर की उस यात्रा का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया में प्राचीन भारतीय संस्कृति (विशेषकर रामायण और महाभारत के प्रभाव) की खोज, एशियाई सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देना और अपने विश्व-विद्यालय ‘विश्व भारती’ के लिए समर्थन जुटाना था। टैगोर ने सुमात्रा, जकार्ता, सुराबाया, सोलो, बांडुंग, योग्याकार्ता और बाली के विभिन्न शहरों का दौरा किया था।

जावा में, उन्होंने प्रसिद्ध बोरोबुदुर मंदिर का दौरा कर सीढ़ियों पर बैठकर ‘टू जावा’ नामक कविता भी लिखी थी। टैगोर महाकाव्यों पर आधारित बाली और जावा नृत्य रूपों से बहुत प्रभावित हुए। उनके सहयोगियों ने वहां ‘बाटिक’ छपाई की कला सीखी, जिसे बाद में शांतिनिकेतन के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया था।

–आईएएनएस

केआर/


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