तालिबान के नए कानून से महिलाओं की आजादी पर खतरा, यूएन विशेषज्ञों ने जताई चिंता


जिनेवा, 19 जून (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पति-पत्नी के अलग होने की शर्तों को तय करने के लिए तालिबान के नए आदेश से न सिर्फ बाल विवाह को बढ़ावा मिल सकता है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों के लिए हिंसक और अत्याचार भरे रिश्तों से बाहर निकलना भी बहुत मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा, “अप्रैल 2026 में तालिबान के नियंत्रण वाले न्याय मंत्रालय की ओर से जारी किए गए ‘पति-पत्नी के अलगाव’ से जुड़े आदेश से महिलाएं और लड़कियां शोषण और हिंसा के खतरे में आ सकती हैं। इसका असर शिया समुदाय और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों पर भी पड़ सकता है।”

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश बाल विवाह को मान्यता देने जैसा लगता है। यह दिसंबर 2021 के उनके पहले आदेश के उलट है, जिसमें शादी के लिए “एक वयस्क महिला” की सहमति जरूरी बताई गई थी।

विशेषज्ञों ने पहले वाले आदेश का स्वागत किया था और कहा था कि पिछली सरकार के समय भी कम उम्र में शादी एक बड़ी चिंता का विषय रही थी। लेकिन नए आदेश से ऐसा लगता है कि बाल विवाह को फिर से स्वीकार किया जा रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आदेश से अभिभावकों या संरक्षकों को अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने का ज्यादा मौका मिल सकता है। इससे लड़कियों के लिए घरेलू हिंसा की शिकायत करना या उससे बचने के लिए कदम उठाना लगभग असंभव हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, आदेश में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिनके तहत कोई लड़की शादी के बाद युवावस्था आने पर ही अलग होने की मांग कर सकती है। इसका मतलब है कि उसे शादी से पहले बचाने के बजाय उसे कई सालों तक मुश्किल हालात झेलने पड़ सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया, “इससे लड़कियां कई सालों तक शारीरिक, मानसिक, यौन और आर्थिक नुकसान का सामना करने के लिए मजबूर हो सकती हैं, उसके बाद ही वे राहत की मांग कर पाएंगी।”

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि यह आदेश उन महिलाओं और लड़कियों के लिए अलग होना बहुत कठिन बना देता है जो अपने पति या ससुराल वालों की हिंसा का सामना कर रही हैं। उनके लिए ऐसी हिंसा की शिकायत करना और अलग होने की अनुमति पाना बहुत मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों ने यह भी याद दिलाया कि अफगानिस्तान कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों से जुड़ा हुआ है, जैसे महिलाओं के साथ हर तरह के भेदभाव को खत्म करने वाला समझौता, यातना और अमानवीय व्यवहार के खिलाफ समझौता, और बच्चों के अधिकारों से जुड़ा समझौता।

उन्होंने कहा, “शादी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और कानूनी मामला हो सकता है, लेकिन हम तालिबान के अधिकारियों को याद दिलाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत उनकी जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं और बच्चों को हिंसा से बचाएं और उनके सम्मान, समानता और सुरक्षा के अधिकारों की रक्षा करें। हम भेदभाव वाली इन व्यवस्थाओं को वापस लेने की अपील करते हैं।”

–आईएएनएस

एवाई/डीकेपी


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