17 मई 2010: भारतीय मुक्केबाजों ने रचा था इतिहास, इंग्लैंड को पीछे छोड़ हासिल किया था पहला स्थान


नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। भारत में मुक्केबाजी बहुत तेजी और मजबूती से बढ़ता हुआ खेल है। पुरुष और महिला दोनों ही वर्ग में भारतीय मुक्केबाजों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी दमदार मौजूदगी पिछले एक दशक में दर्ज कराई है। ओलंपिक हो या विश्व चैंपियनशिप, एशियाई खेल हों या कॉमनेवल्थ गेम्स हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय मुक्केबाजों का जलवा दिखा है। मुक्केबाजी की दुनिया में भारतीयों का जलवा दिखने वाला है, इसकी झलक हमें 16 साल पहले 17 मई 2010 को मिली थी।

भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास में 17 मई 2010 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। भारतीय मुक्केबाजों ने इस दिन इतिहास रचा था और कॉमनवेल्थ बॉक्सिंग चैंपियनशिप के सभी छह स्वर्ण पदक अपने नाम किए थे। सर्वाधिक 36 अंकों के साथ भारतीय टीम पहले स्थान पर रही थी, जबकि इंग्लैंड 34 अंक के साथ दूसरे नंबर पर रही थी। भारत के मुक्केबाजों ने अपने दमदार प्रदर्शन से दुनियाभर के प्रशंसकों को हैरान कर दिया था।

भारत की तरफ से विजेंद्र सिंह, दिनेश कुमार, परमजीत समोटा, अमनदीप, सुरंजॉय, और जय भगवान ने अपने-अपने वर्ग का फाइनल जीत स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले विजेंद्र सिंह (75 किग्रा), अमनदीप सिंह (49 किग्रा), सुरंजॉय सिंह (52 किग्रा), जय भगवान (60 किग्रा), दिनेश कुमार (81 किग्रा), और परमजीत समोटा (91+ किग्रा) ने स्वर्ण पदक जीता था। विजेंद्र सिंह को सर्वश्रेष्ठ बॉक्सर का अवार्ड मिला था।

इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय मुक्केबाजों ने नियमित तौर पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के लिए पदक जीता है। मैरी कॉम ने 2012 में लंदन ओलंपिक में 51 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीता था। इसके बाद लवलीना बोरगोहेन ने टोक्यो ओलंपिक 2020 में महिलाओं की 69 किग्रा श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन और भी अच्छा रहा है। पुरुषों के साथ ही महिला मुक्केबाजी भी बेहतर कर रही है। निखत जरीन, जैस्मीन लंबोरिया, साक्षी चौधरी और मीनाक्षी हुड्डा लगातार शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। यह भारतीय मुक्केबाजी के सुरक्षित और स्वर्णिम भविष्य का संकेत है।

–आईएएनएस

पीएके


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