महान क्रांतिकारी सुखदेव : शहादत से जलाई आजादी की लौ, आज भी प्रेरणास्रोत


नई दिल्ली, 14 मई (आईएएनएस)। देश में क्रांतिकारियों की जब भी बात की जाती है तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की वीरता की कहानी याद आ जाती है। इन्हीं क्रांतिकारियों में से एक सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना के लायलपुर में हुआ था।

सुखदेव थापर ने अपनी छोटी-सी उम्र में ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग छेड़ दी थी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। जब सुखदेव तीन वर्ष के थे तो उनके पिता का निधन हो गया था। बचपन से ही सुखदेव में कुछ कर गुजरने की चाह थी। उन्होंने युवाओं में देशभक्ति का जज्बा भरने के साथ-साथ खुद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।

सन 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के समय सुखदेव की उम्र करीब 12 वर्ष थी। इस घटना ने उनके मन पर गहरा असर डाला। लायलपुर के सनातन धर्म हाईस्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया, जहां उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई। वर्ष 1926 में लाहौर में ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन हुआ, जिसके मुख्य संयोजक सुखदेव थे।

‘साइमन कमीशन’ के विरोध में निकाली गई रैली पर लाठीचार्ज में जब लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनका निधन हो गया, तब सुखदेव और भगत सिंह ने बदला लेने का फैसला किया।

कहा जाता है कि सुखदेव थापर इस युवा क्रांतिकारी आंदोलन की नींव और रीढ़ थे। उन्होंने महात्मा गांधी को जेल से एक पत्र लिखा था, जो आज भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है।

लाहौर षड्यंत्र मामले में आरोपी बनाए गए सुखदेव थापर, शिवराम राजगुरु और भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई। मात्र 24 वर्ष की उम्र में सुखदेव ने देश के लिए अपना बलिदान दे दिया।

–आईएएनएस

एसडी/एबीएम


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