लखनऊ की शान, करुणा और विरासत का प्रतीक,बांहें फैलाए आपका इंतजार कर रहा है 240 साल पुराना रूमी गेट… 

लखनऊ की शान और पहचान रूमी गेट तुर्की शैली में निर्मित है। इसे डिजाइन करने वाले किफायतउल्ला वही आर्किटेक्ट हैं, जिन्होंने आसिफी इमामबाड़ा डिजाइन किया था। इसका नाम रूमी गेट रखा गया, क्योंकि यह रोमन इंपायर से प्रेरित है। रूमी रोम से निकला नाम है। तुर्की शैली की वजह से एक समय इसे तुर्किश गेटवे भी कहा जाता था। 1784 से 86 के बीच 60 फीट ऊंचा यह गेट तैयार किया गया। समय के साथ हर तकनीक विकसित होती गई। बनाई जाने वाली हर चीज आधुनिक होती गई और इसके आकर्षण में चार चांद लगते गए, लेकिन 240 साल पहले बीच रास्ते पर बनाए गए रूमी गेट के आकर्षण में कभी कमी नहीं आ पाई।

लखनऊ का प्रवेश द्वार

आगरा जाने वाला ताजमहल जरूर देखता है। सफेद संगमरमर की आसमान छूती इमारत देखते ही दिल में उतर जाती है। इसे बनवाने वाला शाहजहां भी इसे निहारता ही रह गया था। उसने जमीन पर अजूबा रचने वालों के हाथ कलम करवा दिये थे ताकि दूसरा ताजमहल न बन पाए।  शाहजहां का वो गुरूर ताजमहल में साफ झलकता है। देखने वाले की निगाहें उसके कलश पर जाकर टिक जाती हैं, उसकी ऊंचाई पर हर कोई मुग्ध हो जाता है। यह मुग्धता बादशाह की मोहब्बत से है। यह मुग्धता बादशाह के उस गुरूर से है, जिसने दूसरे ताजमहल पनपने के रास्ते बंद कर दिए और शायर को लिखना पड़ा कि एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक।जमुना तट से गोमती तट पर आइए और लखनऊ का रूमी गेट निहारिए तो माहौल बिल्कुल उलटा मिलेगा। हालांकि बादशाह ने इसे भी बनाया, लेकिन बनाने वाले ने इसमें अपना गुरूर नहीं करुणा डाली। बनाने वालों के हाथ नहीं कटवाए, बल्कि इसे तो बनवाया ही उन हाथों से जो अकाल में काम को तरस रहे थे। शायद यही वजह है कि रूमी गेट की तरफ बढ़िए तो वो बाहें फैलाए इंतजार करता नजर आता है।

रूमी गेट की खूबसूरती पर नजरें ठहर जाती हैं। 1784 में ऐतिहासिक आसिफी इमामबाड़े के बाहर नवाब आसिफुद्दौला ने इसे तामीर कराया था। वक्त के थपेड़ों ने इसे बदरंग कर दिया। इसमें दरार पड़ गईं, लेकिन इसके भीतर की तीन सड़कों से हजारों गाड़ियां रोज गुजरती रहीं। लोग इसके सामने तस्वीरें खिंचाते रहे। इसे लखनऊ का प्रवेशद्वार कहा गया। इसे लखनऊ के सिग्नेचर के रूप में पहचाना गया।

टूरिस्ट गाइड ने दशकों से होते बदलाव को देखा

रूमी गेट और बड़े इमामबाड़े में आने वाले पर्यटकों को इतिहास की बातें बताने वाले टूरिस्ट गाइड दिलबर ने रूमी गेट में पिछले कुछ दशकों में आए बदलावों को करीब से देखा है। वो बताते हैं कि पहले के दौर में आने वाले पर्यटकों में बड़ी जिज्ञासाएं होती थीं, वो तरह-तरह के सवाल पूछा करते थे, लेकिन अब आने वाले पर्यटक इन इमारतों के साथ अपनी तस्वीरें खिंचाकर ही खुश हो जाते हैं। वो कहते हैं कि सरकार का नजर-ए-करम हुआ, तो रूमी गेट चमक गया। ऐसे ही इमामबाड़े पर भी हो जाए, तो यह भी चमक जाए।

सब सो जाते हैं, लेकिन यह जागता रहता है

रात होती है, तो इंसानों के साथ पार्क, इमारतें, पर्यटन स्थल सब सो जाते हैं। कहीं कोई घूमता नजर नहीं आता, लेकिन रूमी गेट कभी सोता नहीं। रात में तांगे नहीं होते, ऊंट की सवारी नहीं होती, नारियल पानी और गन्ने का जूस बेचने वाले नहीं होते, लेकिन रूमी गेट के आसपास लोगों का जमावड़ा कभी खत्म नहीं होता। रात को 3 बजे भी पर्यटक तस्वीरें खिंचाते नजर आते हैं।

Related Articles

Latest News