'शोले' की भीड़ के बीच 'पाथेर पांचाली' का अस्तित्व जरूरी: निर्देशक कौस्तव नारायण


मुंबई, 25 अप्रैल (आईएएनएस) भारतीय सिनेमा के इतिहास में सत्यजीत रे एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी कला से भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर मान दिलाया था। उनकी फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ ने सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी थी। अभिनेत्री पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में निर्देशक और पटकथा कौस्तव नारायण निरोगी ने सत्यजीत रे की कार्यशैली के बारे में बात की।

शनिवार को अभिनेत्री कौस्तव नारायण ने इंस्टाग्राम स्टोरीज पर पॉडकास्ट का क्लिप शेयर किया। इसमें निर्देशक ने बताया कि व्यावसायिक सफलता और कलात्मक उत्कृष्टता दोनों का अस्तित्व जरूरी होता है। अगर सिनेमा सिर्फ पैसा कमाने का जरिए बन जाएगा तो हम लोग सत्यजीत रे जैसी महान विरासतों को खो देंगे।

उन्होंने कहा, “एक बार जीपीसीपी ने सत्यजीत रे से संपर्क किया। उन्होंने रे से कहा कि बस आपसे बस इतनी गुजारिश है कि अपनी अगली फिल्म के क्रेडिट में हमारा नाम लिख दें। इसके बाद रे ने जवाब दिया, “बिल्कुल। मुझे स्क्रिप्ट देखने की भी जरूरत नहीं है।”

कौस्तव ने आज के निर्माताओं को महत्वपूर्ण सलाह देते हुए कहा कि आज के फिल्ममेकर्स को गलतियों से डरे बिना नए प्रयोग करने चाहिए, ताकि भारतीय सिनेमा की विविधता बनी रहे।

कौस्तव नारायण ने कहा, “पैसा कमाना गलत नहीं है, लेकिन निर्माताओं को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा ‘अर्थपूर्ण प्रोजेक्ट्स’ और नई रचनात्मक सोच के लिए बचाकर रखना चाहिए। रित्विक घटक जैसे दिग्गजों ने कम पैसों में कितने बेहतरीन प्रोजेक्ट्स पर काम किया है।”

उन्होंने आगे कहा, “मान लीजिए कि दो सिनेमा हॉल अगल-बगल में हैं, एक में ‘शोले’ चल रही है, तो दूसरे में ‘पाथेर पांचाली’। स्वाभाविक है कि शोले देखने वालों की भीड़ कहीं ज्यादा होगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या भीड़ कम होने के कारण ‘पाथेर पांचाली’ जैसी फिल्में बननी बंद हो जानी चाहिए? बिल्कुल नहीं।”

बता दें कि सत्यजीत रे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के वो कालजयी निर्देशक थे, जिन्होंने हमें ‘पाथेर पांचाली’ दी और भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।

हालांकि, पाथेर पांचाली बनना भी कोई आसान नहीं था। इस कहानी ने 500 पन्नों का बलिदान मांगा था।

दरअसल, लेखक विभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने फिल्म पाथेर पांचाली लिखने से पहले एक कहानी लिखी थी, लेकिन एक दिन घूमने के दौरान उनकी नजर 8 साल की बच्ची पर पड़ी, बिखरे हुए बाल, चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान। उन्हें लगा कि यही बच्ची उनकी कहानी की नायिका हो सकती है। वे तुरंत घर गए और अपनी पुरानी स्क्रिप्ट के सारे पन्ने फाड़ दिए। फिर, उन्होंने उस बच्ची को अपनी कहानी का केंद्र बनाया। आगे चलकर वही किरदार दुर्गा के नाम से मशहूर हुई, जिसे भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार और अमर पात्रों में गिना जाता है। कहानी तैयार होने के बाद सत्यजीत रे ने इस कहानी को पर्दे पर उतारा, जिसे पूरी दुनिया ने सराहा।

–आईएएनएस

एनएस/


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