लखनऊ, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा पर कई गंभीर आरोप लगाए गए, खासतौर पर महिला आरक्षण विधेयक को लेकर। इसके जवाब में प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने सपा और अन्य विपक्षी दलों पर जुबानी हमला किया।
दयाशंकर सिंह ने कहा कि संसद में महिला आरक्षण विधेयक का जिस तरह से विरोध किया गया, वह इस बात का संकेत है कि विपक्षी दल महिलाओं को नेतृत्व में आगे आते नहीं देखना चाहते। उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दल परिवारवादी राजनीति से ग्रसित हैं, जहां केवल अपने परिवार के लोगों को ही आगे बढ़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि इन दलों ने सहयोग किया होता तो यह विधेयक महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होता।
उन्होंने कहा कि विधेयक के गिरने पर विपक्षी दलों ने जश्न तक मनाया, जो महिलाओं के सम्मान के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने का संकल्प लिया है और इसे हर हाल में पूरा किया जाएगा।
सपा के ‘आरक्षण से पहले संरक्षण’ वाले बयान पर पलटवार करते हुए दयाशंकर सिंह ने कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार में कानून का नामोनिशान तक नहीं था। महिलाओं पर अत्याचार आम बात थी। जेल से सीधे डीजीपी से मिलने अपराधी आते थे। लखनऊ में पुलिस उपाधीक्षक को एसपी के बंगले के सामने से घसीटकर ले जाया जाता था। इस तरह का कानून था कि जब भी हमारी माताएं-बहनें कहीं बाहर जाती थीं, तो घर वाले चिंतित रहते थे कि बेटी सकुशल घर वापस आएगी या नहीं। आज योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित कर दिया है। आज रात के दो बजे या तीन बजे भी हमारी माताएं-बहनें स्कूटी पर घूम रही हैं, बिना किसी डर के। समाजवादी पार्टी तो यह बात कभी सोच भी नहीं सकती थी कि उत्तर प्रदेश में इस तरह का कानून का राज स्थापित होगा, क्योंकि जितने भी अराजक तत्व हैं, उनका संरक्षण समाजवादी पार्टी में मिलता रहा है।
अखिलेश यादव द्वारा पेश की गई पीडीए की नई परिभाषा पर भी मंत्री ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि अब वे पीडीए को समय-समय पर अपने हिसाब से बदलते रहते हैं। कभी वे पीडीए को पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक कहते हैं, कभी पीडीए को महिलाओं से जोड़ते हैं, तो कभी नवजवानों से जोड़ते हैं। वे खुद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर पीडीए क्या है। क्योंकि वास्तव में पीडीए कुछ नहीं है। जिस पीडीए की वे बात करते हैं, उसके लिए वे कोई काम नहीं करते। उनकी पूरी पार्टी परिवारवाद में लिप्त है।
उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी में तो कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना नहीं देख सकता, कोई मुख्यमंत्री बनने का सपना भी नहीं देख सकता। फिर वे किस पीडीए की बात करते हैं? जब आप पीडीए की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह तय करें कि अगर भविष्य में कभी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है, तो उसका मुख्यमंत्री पीडीए का कोई व्यक्ति बनेगा या फिर उनका परिवार का व्यक्ति बनेगा? कम से कम यह तो लोगों से कह दें। दूसरी बात, महिलाओं के अधिकारों को लेकर जो विधेयक अभी पास हो रहा था, उसमें महिलाओं को अधिकार मिल रहे थे, लेकिन उन्होंने उस अधिकार को रोकने का काम किया। जो खुद दलितों और पिछड़ों को आगे नहीं आने देना चाहता, वही पीडीए की बात करता है। इसलिए पीडीए केवल उनका एक दिखावा मात्र है। उसमें कहीं भी कोई सच्चाई नहीं है।
–आईएएनएस
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