हैदराबाद, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के परिवार में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) नाम को लेकर आपसी खींचतान देखने को मिल सकती है।
केसीआर की बेटी और तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता की ओर से यह संकेत दिए जाने के कुछ ही दिनों बाद कि उनकी प्रस्तावित पार्टी का नाम टीआरएस हो सकता है, उनके भाई और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव ने कहा है कि बीआरएस अपनी पार्टी का पुराना नाम टीआरएस वापस रखने पर विचार कर रही है।
के. कविता ने पिछले साल बीआरएस छोड़ दी थी। केसीआर ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित कर दिया था। खबरों के मुताबिक, वह टीआरएस नाम अपनाने पर विचार कर रही हैं। उनका कहना है कि यह नाम इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है।यह कहते हुए कि टीआरएस का अब कोई अस्तित्व नहीं है, उन्होंने टिप्पणी की कि कोई भी व्यक्ति इस नाम का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र है।
दरअसल, केसीआर ने 2001 में तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के आंदोलन को फिर से तेज करने के लिए टीआरएस का गठन किया था। 2022 में उन्होंने पार्टी का विस्तार देश के अन्य हिस्सों तक करने के उद्देश्य से इसका नाम बदलकर बीआरएस कर दिया था।
जब से 2023 के चुनावों में बीआरएस को कांग्रेस के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी है, बीआरएस के नेताओं का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि पार्टी ने अपने नाम से ‘तेलंगाना’ शब्द हटाने के बाद लोगों के साथ अपना जुड़ाव खो दिया है।
उनका मानना है कि टीआरएस के सफर में ‘तेलंगाना’ की भावना हमेशा से एक अहम हिस्सा रही है और जब पार्टी का नाम बदलकर बीआरएस कर दिया गया, तो ऐसा लगा मानो पार्टी अपने मूल तत्व से ही दूर हो गई हो।
रविवार को मंचिर्याल जिले में एक पार्टी बैठक को संबोधित करते हुए केटी रामा राव ने भी इसी बात को दोहराया। उन्होंने बताया कि तेलंगाना में अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाने की एक व्यापक रणनीति के तहत बीआरएस का नाम वापस टीआरएस रखने के मुद्दे पर विचार-विमर्श कर रही है।
रामा राव ने स्वीकार किया कि टीआरएस से बीआरएस में नाम बदलने के कारण पार्टी के साथ जुड़ी ‘तेलंगाना’ की मजबूत भावना कुछ कमजोर पड़ गई थी। नाम बदलने की वजह से हमें राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ा। लोगों का टीआरएस और उसके गुलाबी झंडे के साथ जो भावनात्मक जुड़ाव है, उसे अलग नहीं किया जा सकता।”
रामा राव का मानना है कि पार्टी की पुरानी पहचान को फिर से अपनाने से पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह साफ कर दिया कि अंतिम फैसला पार्टी प्रमुख केसीआर ही लेंगे।
खुद केसीआर ने ही पिछले साल दिसंबर में पार्टी मुख्यालय तेलंगाना भवन में अपने विधायकों की एक बैठक के दौरान टीआरएस में वापस लौटने का संकेत दिया था। इसके बाद हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बार-बार बीआरएस को टीआरएस कहकर संबोधित किया था।
बीआरएस के कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के भीतर पहले ही यह मांग की थी कि खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिशों के तहत टीआरएस नाम को बहाल किया जाना चाहिए।
इस बात से भली-भांति परिचित कि तेलंगाना के पास लोकसभा की सीमित सीटें (17) हैं, जिनसे वे राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित नहीं कर पाएंगे, केसीआर बीआरएस का विचार लेकर सामने आए।
2014 में तेलंगाना राज्य बनाने का अपना लक्ष्य हासिल करने और सत्ता में दो कार्यकाल पूरे करने के बाद, केसीआर को पूरा भरोसा था कि वे अन्य राज्यों में भी विकास और कल्याण के ‘तेलंगाना मॉडल’ को दोहरा पाएंगे।
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों में पार्टी का विस्तार करने के उद्देश्य से केसीआर ने अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की घोषणा की। अक्टूबर 2022 में ही यह क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बन गई, जब पार्टी की आम सभा की बैठक में इसका नाम बदलकर बीआरएस करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
पार्टी पूरे भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए जोर-शोर से प्रयास कर रही थी। इसी क्रम में केसीआर ने पार्टी की आंध्र प्रदेश इकाई के अध्यक्ष की नियुक्ति की और विभिन्न राज्यों के उन नेताओं के साथ कई बैठकें कीं जो उनके साथ हाथ मिलाने के इच्छुक थे।
नई दिल्ली में अपना केंद्रीय कार्यालय खोलने के साथ ही बीआरएस देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी गतिविधियों का विस्तार करने की तैयारी में जुट गई थी। 2024 के लोकसभा चुनावों को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रही यह पार्टी 100 लोकसभा सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही थी।
हालांकि, 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनावों में मिली हार ने पार्टी की सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 2024 के लोकसभा चुनावों में उसे और भी अधिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, क्योंकि उसे एक भी सीट नहीं मिली। लगभग दो वर्षों तक शांत रहने के बाद, बीआरएस का नेतृत्व अब पार्टी में नई जान फूंकने की कोशिश कर रहा है।
उनका मानना है कि टीआरएस नाम पर वापस लौटने से लोगों के साथ फिर से जुड़ने के लिए सही माहौल तैयार होगा। 27 अप्रैल को पार्टी अपने स्थापना दिवस पर एक बार फिर टीआरएस बन सकती है।
–आईएएनएस
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