नई दिल्ली, 11 मार्च (आईएएनएस) राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने बुधवार को सत्ता पक्ष के सांसद से कहा कि शायद वे हरित क्रांति व श्वेत क्रांति जैसे विषयों को पढ़ना चूक गए।
दरअसल, राज्यसभा में ग्रामीण विकास मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसद डॉ अनिल सुखदेव राव कहा कि 2014 से पहले गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। पक्के रास्ते, पीने के लिए शुद्ध पानी व स्वास्थ्य सुविधाएं दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं थीं। इसके जवाब में शिवसेना यूबीटी सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “शायद हो सकता है कि डॉक्टर बनने से पहले अनिल सुखदेव राव इतिहास की किताबों में ग्रीन रेवोल्यूशन और व्हाइट रेवोल्यूशन जैसे अध्याय पढ़ने से चूक गए हों। अगर वे उन्हें पढ़ लेते तो शायद ऐसी बातें न कहते।”
प्रियंका चतुर्वेदी का कहना था कि वह भाजपा सांसद को सुन रही थी। वे भी उनकी तरह महाराष्ट्र के सांसद हैं। वे कह रहे थे कि पिछले 70 सालों में कुछ भी नहीं हुआ। न रोजगार थे, न महिलाओं की सुरक्षा थी, न विकास था। जैसे सब कुछ केवल 2014 के बाद ही शुरू हुआ हो। प्रियंका चतुर्वेदी ने यहां हरित क्रांति और श्वेत क्रांति जैसे विषयों का उदाहरण देते हुए कृषि क्षेत्र में हुई तरक्की का जिक्र किया।
चतुर्वेदी ने कहा, “जब हम ग्रामीण भारत की बात करते हैं और ग्रामीण विकास मंत्रालय की बात करते हैं तो यह केवल यूनियन बजट का एक सेक्टर नहीं है। यह हमारे देश की सोशल और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। ग्रामीण भारत केवल भारत का दिल ही नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा है। हमारे देश की दो-तिहाई से अधिक आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस मंत्रालय के माध्यम से जो बजट आवंटन हुआ है, उसमें वृद्धजन, विधवाएं और दिव्यांगजन आदि वर्गों पर अभी भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि बजट में बार-बार कई राज्यों के नाम आते हैं, लेकिन कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। महाराष्ट्र में इस समय एग्रेरियन डिस्ट्रेस की स्थिति बनी हुई है। वर्ष 2025 में जनवरी से मार्च के बीच करीब साढ़े सात सौ से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। इसलिए जो विकास की एक रोशन तस्वीर दिखाई जा रही है, लेकिन अगर थोड़ा ध्यान महाराष्ट्र की स्थिति पर भी दिया जाता तो बेहतर होता।
उन्होंने कहा कि वीबीजी राम जी के बारे में भी बहुत चर्चा हुई। प्रचार यह किया गया कि सवा सौ दिन का रोजगार दिया जाएगा, लेकिन इस योजना का जो वित्तीय भार राज्यों के बजट पर पड़ रहा है, उसकी चर्चा कम होती है। अगर हम औसत देखें, तो वीबीजी राम जी के माध्यम से सिर्फ लगभग 48 कार्य दिवस ही रोजगार मिल पा रहा है। बाद में जो अतिरिक्त भार है, वह राज्यों पर डाल दिया गया है, जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने सदन में महिलाओं से जुड़े एक मुद्दे पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर विषय है। यह विषय रूरल इंडिया की महिलाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के डेटा लेबलिंग और कंटेंट मॉडरेशन काम में भर्ती किया जाना है। करीब 70,000 से अधिक लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 800 से अधिक महिलाओं को रोजाना ऐसे वीडियो दिखाए जाते हैं, जो ग्राफिक और यौन रूप से अत्यंत हिंसक होते हैं, ताकि एआई सिस्टम्स को ट्रेन किया जा सके, लेकिन इन महिलाओं को कोई मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध नहीं है।
उनसे नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट साइन कराए जाते हैं, इसलिए इस पूरे मुद्दे की वास्तविक जानकारी सामने भी नहीं आ पाती। उन्होंने कहा कि ये जो एआई कंपनियां यहां काम करा रही हैं, उनके राजस्व का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अमेरिका जाता है, जबकि हमारे देश में मात्र लगभग 10 प्रतिशत ही रह जाता है। उन्होंने कहा कि इसलिए वह मंत्री जी से आग्रह करना चाहती हैं कि यह स्पष्ट किया जाए कि इस काम में कितनी महिलाओं की भर्ती की गई है और उन महिलाओं के लिए क्या सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था की गई है।
–आईएएनएस
जीसीबी/डीके
