मुंबई, 4 मार्च (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के दिल और दिमाग में बसे रहते हैं। ऐसे ही एक किरदार का नाम है ‘कल्लू मामा’। यह किरदार इतना मशहूर हुआ कि इसे निभाने वाले अभिनेता सौरभ शुक्ला को लोग आज भी इसी नाम से बुलाते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस फिल्म से उन्हें यह पहचान मिली, उसमें वह सिर्फ अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि कहानी लिखने वालों में भी शामिल थे।
सौरभ शुक्ला का जन्म 5 मार्च 1963 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनके घर में बचपन से ही कला और संगीत का माहौल था। उनकी मां जोगमाया शुक्ला, भारत की पहली महिला तबला वादक मानी जाती थीं, और उनके पिता, शत्रुघ्न शुक्ला, आगरा घराने के जाने-माने गायक थे। जब सौरभ दो साल के थे, तब उनका परिवार दिल्ली आकर बस गया। उनकी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में ही हुई।
बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने थिएटर का रुख किया। उन्होंने 1984 में अपने करियर की शुरुआत मंच से की। थिएटर ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सिखाईं। कई सालों तक उन्होंने नाटक किए। फिल्मों में उन्हें पहला बड़ा मौका शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में मिला। इस फिल्म में उनका छोटा, लेकिन असरदार रोल था।
इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन असली पहचान उन्हें 1998 में आई फिल्म ‘सत्या’ से मिली। इस फिल्म में उन्होंने गैंगस्टर कल्लू मामा का किरदार निभाया। यह रोल दर्शकों को इतना पसंद आया कि सौरभ शुक्ला का नाम ही ‘कल्लू मामा’ पड़ गया। अभिनय के साथ-साथ सौरभ शुक्ला ने इस फिल्म की कहानी लिखने में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने अनुराग कश्यप के साथ मिलकर फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी।
‘सत्या’ की सफलता के बावजूद, उन्हें लंबे समय तक एक अच्छे प्रोजेक्ट का इंतजार करना पड़ा। यह इंतजार रंग लाया और वह फिल्म ‘बर्फी’ में नजर आए। इसके बाद ‘जॉली एलएलबी’ ने उनका करियर बदल दिया। इस फिल्म में उन्होंने जस्टिस सुंदरलाल त्रिपाठी का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसकेअलावा, वह ‘पीके’ और ‘रेड’ जैसी कई अन्य फिल्मों में भी नजर आए। हर फिल्म में उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाया और लोगों का दिल जीता।
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