मुंबई, 23 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा का संगीत हमेशा बदलता रहा है, लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो सिर्फ दौर का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि खुद एक नया दौर रच देते हैं। तलत महमूद उन्हीं चुनिंदा नामों में से एक हैं। उन्होंने 1950 के दशक में फिल्मी दुनिया को गजल की ऐसी मिठास दी, जिसने गीतों के मायने ही बदल दिए। उस समय फिल्मों में ज्यादातर सीधी-सादी धुनें और रोमांटिक गीत हुआ करते थे, लेकिन उन्होंने उर्दू अदब, शायरी और भावनाओं की गहराई को पर्दे पर उतारा।
24 फरवरी 1924 को लखनऊ में जन्मे तलत महमूद की आवाज में एक खास तरह की हल्की कंपन होती थी, जो सुनने वाले के दिल को छू जाती थी। जब वह किसी शेर को गाते तो ऐसा लगता जैसे हर शब्द को महसूस करके पेश किया जा रहा हो। उनकी गायकी में शोर नहीं, बल्कि सादगी होती थी। यही वजह रही कि फिल्मी गजल को एक अलग शैली के रूप में पहचाना जाने लगा।
1950 का दशक उनके लिए सुनहरा दौर था। ‘शाम-ए-गम की कसम’, ‘जलते हैं जिसके लिए’ और ‘फिर वही शाम वही गम’ जैसे गीतों के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि गजल बड़े पर्दे पर भी असरदार हो सकती है। उस दौर में जब कई गायक ऊंची आवाज में गा रहे थे, तब तलत ने धीमे अंदाज से अपनी जगह बनाई। उनकी उर्दू पर मजबूत पकड़ ने भी फिल्मी संगीत को समृद्ध किया। शब्दों का सही उच्चारण, हर लफ्ज की साफ अदायगी और शायरी की समझ, ये सब मिलकर उनकी गायकी को अलग बनाते थे।
उनकी वजह से संगीतकारों ने भी गजल आधारित धुनों पर ज्यादा काम करना शुरू किया। इस तरह फिल्मी गजल एक पहचान बन गई और दर्शकों ने इसे खुले दिल से अपनाया।
तलत महमूद का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। 1960 में उन्होंने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, जो आज बांग्लादेश है, की एक फिल्म के लिए दो बंगाली गीत गाए। यह उस समय में बड़ी बात थी। भाषा अलग थी, लेकिन उनकी आवाज की मिठास ने वहां भी लोगों को अपना दीवाना बना लिया। यह उनके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का प्रमाण था।
समय के साथ संगीत की पसंद बदली, लेकिन तलत महमूद की दी हुई फिल्मी गजल की पहचान आज भी कायम है।
–आईएएनएस
पीके/डीकेपी
