Friday, February 20, 2026

भारत और जापान के तकनीकी संबंध डिजिटल भविष्य को आकार देने में निभाएंगे महत्वपूर्ण भूमिका


नई दिल्ली, 20 फरवरी (आईएएनएस)। इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर क्षेत्र में भारत और जापान के बीच बढ़ते तकनीकी संबंध अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एशिया के टेक दिग्गज के बीच मजबूत आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को और मजबूत करने वाले नए कारक के रूप में उभर रहे हैं।

जैसे-जैसे सेमीकंडक्टर, जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) वैश्विक प्रभाव की दिशा तय कर रहे हैं, यह उभरता हुआ “तकनीकी गठबंधन” क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी बनता जा रहा है।

इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, 2025 के अंत में हुए 15वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के बाद यह साफ हो गया है कि यह संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र और खुले डिजिटल भविष्य की संरचना तैयार करने से जुड़ा है।

जहां भारत के पास बड़ा बाजार और युवा उपयोगकर्ताओं की विशाल संख्या है, वहीं जापान उच्च स्तरीय विनिर्माण क्षमता और दीर्घकालिक पूंजी उपलब्ध कराता है। दोनों मिलकर एक मजबूत लोकतांत्रिक विकल्प तैयार कर रहे हैं, जो सरकारी नियंत्रण वाले डिजिटल मॉडलों का संतुलित जवाब बन सकता है।

इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत इसकी पूरक प्रकृति है। भारत बड़े स्तर पर डिजिटल बदलाव का वैश्विक उदाहरण बनकर उभरा है। “इंडिया स्टैक”, जिसमें आधार की बायोमेट्रिक पहचान, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और नया ‘एग्री-स्टैक’ शामिल है, ने एक अरब लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। लेख में कहा गया है कि इन प्रणालियों ने पारंपरिक ढांचागत बाधाओं को पार करने में मदद की है और यह साबित किया है कि डिजिटल सार्वजनिक साधन समावेशी विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।

लेख में दिसंबर 2025 में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और जापान की सेमीकंडक्टर कंपनी आरओएचएम कंपनी लिमिटेड के बीच बने संयुक्त उद्यम का उदाहरण देते हुए इस तालमेल को दर्शाया गया है। इस समझौते के तहत टाटा ग्रुप असम के जगिरोड में स्थापित 3.2 अरब डॉलर (करीब 27,000 करोड़ रुपए) की नई सुविधा में आरओएचएम के भारत में डिजाइन किए गए ऑटोमोबाइल ग्रेड पावर सेमीकंडक्टर का असेंबली और परीक्षण कर रहा है। ये चिप्स अगली पीढ़ी के इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग किए जाएंगे।

आरओएचएम की परिपक्व तकनीक और टाटा की ‘आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (ओएसएटी) क्षमता के मेल से भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार के लिए आपूर्ति समय कम हुआ है। 2026 की शुरुआत में बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने वाला यह सहयोग ‘सिलिकॉन शील्ड’ का उदाहरण माना जा रहा है, जो दिखाता है कि भारतीय विनिर्माण जापानी गुणवत्ता मानकों को पूरा कर सकता है और वैश्विक बाजार की सेवा कर सकता है।

हालांकि सॉफ्टवेयर क्षेत्र में भारत की मजबूती पर कोई सवाल नहीं है, लेकिन हार्डवेयर के लिए विदेशों पर निर्भरता लंबे समय से एक रणनीतिक कमजोरी रही है। 2020 के दशक की शुरुआत में सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने यह सिखाया कि तकनीक का इस्तेमाल दबाव के साधन के रूप में भी किया जा सकता है। ऐसे में सेमीकंडक्टर सामग्री, फोटोरेजिस्ट और लिथोग्राफी उपकरणों में जापान की वैश्विक पकड़ भारत के लिए एक मजबूत समाधान बन सकती है।

फरवरी 2026 के बजट में शुरू किए गए ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) 2.0’ के जरिए दोनों देश एक ऐसे सहयोगी इकोसिस्टम की ओर बढ़े हैं, जहां भारतीय चिप डिजाइन क्षमता और जापानी औद्योगिक नेतृत्व साथ मिलकर काम करेंगे।

लेख में यह भी बताया गया है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस) का 40,000 करोड़ रुपए के बजट के साथ विस्तार किया गया है। यह फंड सप्लाई चेन के उस हिस्से को मजबूत करने पर केंद्रित है, जो अब तक कमजोर रहा है। इसके तहत जापानी लघु एवं मध्यम उद्योगों (एसएमई) को धोलेरा और साणंद जैसे नए इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टरों में विशेष निर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

यह पहल केवल उपकरणों के असेंबली तक सीमित नहीं है, बल्कि उन चिप्स की बौद्धिक संपदा (आईपी) पर अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक कदम है, जो स्मार्ट सिटी से लेकर रक्षा प्रणालियों तक हर क्षेत्र को शक्ति देते हैं।

–आईएएनएस

डीबीपी/


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