Tuesday, February 17, 2026

रवि टंडन: निर्देशन में संगीत प्रेम की दिखती थी झलक, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के गुनगुनाते रहते थे गीत


मुंबई, 16 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा के दिग्गज निर्माता-निर्देशक रवि टंडन अपनी फिल्मों के साथ-साथ संगीत के प्रति अपनी गहरी रुचि के लिए भी जाने जाते थे। कॉलेज के दिनों में वह खाली समय में मुकेश, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के गीतों को गुनगुनाते रहते थे। उनका ये संगीत प्रेम उनके निर्देशन की शैली में भी झलकता था।

17 फरवरी 1935 को आगरा में जन्मे रवि टंडन को बचपन से ही कला और संगीत के प्रति रुचि थी। आगरा के स्कूल और कॉलेज में उनके साथी बताते हैं कि रवि टंडन हंसमुख और रचनात्मक स्वभाव के थे। खाली समय में गाने सुनना और गुनगुनाना उनकी आदत थी। वह कहते थे कि संगीत से मन शांत होता है और यह रचनात्मकता को बढ़ाता है।

मुंबई आने के बाद रवि टंडन ने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के रूप में की और सेट पर फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। इसके साथ ही, उन्होंने निर्माण में संगीत और पृष्ठभूमि की ताकत को भी महसूस किया। उनके लिए गाने सिर्फ गीत नहीं, बल्कि कहानी और किरदार की भावनाओं को प्रकट करने का माध्यम होते थे।

रवि टंडन की फिल्में हमेशा संगीत और कहानी का शानदार मिश्रण प्रस्तुत करती थीं। इसका शानदार उदाहरण उनकी सबसे चर्चित फिल्म ‘खेल खेल में’ है, जिसमें आर.डी. बर्मन के संगीत ने कहानी को जीवंत बना दिया। ‘एक मैं और एक तू’ और ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे’ जैसे गानों से रवि टंडन ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। वह हमेशा कहते थे कि गाने कहानी का हिस्सा होने चाहिए। इसी सोच के कारण उनकी ज्यादातर फिल्में आज भी यादगार हैं।

रवि टंडन की बेटी रवीना टंडन भी अपने पिता की संगीत और कला के प्रति रुचि से प्रेरित रहीं। रवीना ने एक इंटरव्यू में बताया कि पापा हमेशा कहते थे कि संगीत और कला का सम्मान करो और इसे अपने जीवन में अपनाओ।

रवि टंडन ने अपने करियर में कई हिट फिल्में दीं, जिनमें ‘अनहोनी,’ ‘मजबूर,’ ‘नजराना,’ ‘खुद्दार,’ ‘जवाब,’ और ‘जिंदगी’ जैसी फिल्में शामिल हैं। हर फिल्म में संगीत का उनका गहरा अनुभव झलकता था। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ उनका तालमेल दर्शकों के हमेशा दिलों को छूता आया।

11 फरवरी 2022 को 86 साल की उम्र में रवि टंडन का निधन हो गया। उनके जाने से हिंदी सिनेमा ने एक ऐसे निर्देशक को खो दिया, जो संगीत और कहानी को जोड़कर फिल्मों को जीवंत बनाता था।

–आईएएनएस

पीके/डीकेपी


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