Tuesday, February 10, 2026

रवि टंडन : पीएमटी में हुए फेल, लेकिन बने सिनेमा के 'सफल सर्जन'


मुंबई, 10 फरवरी (आईएएनएस)। यह 1950 के दशक के उत्तरार्ध की बात है। आगरा की गलियों से निकला एक नौजवान मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियो के बाहर खड़ा था। जेब में चंद रुपए और आंखों में बड़े सपने, लेकिन वह सपना निर्देशन का नहीं बल्कि ‘डॉक्टर’ बनने का था। नियति को कुछ और ही मंजूर था। प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) में मिली असफलता ने उस युवक को चिकित्सा जगत से तो दूर कर दिया, लेकिन कला के उस ‘ऑपरेशन थिएटर’ में ला खड़ा किया जहां वह आगे चलकर कहानियों और किरदारों की धड़कनें पढ़ने वाला था। यह कहानी है भारतीय सिनेमा के उस ‘सज्जन निर्देशक’ की, जिसे दुनिया रवि टंडन के नाम से जानती है।

रवि टंडन का जन्म 17 फरवरी 1935 को आगरा के एक प्रतिष्ठित पंजाबी परिवार में हुआ था। जब वे मुंबई आए, तो शुरुआत किसी नायक की तरह नहीं बल्कि एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में हुई। मात्र सौ रुपए महीने की तनख्वाह पर उन्होंने पुलिसवाले और डाकू जैसे छोटे-मोटे किरदार निभाए। ‘लव इन शिमला’ (1960) के सेट पर उन्होंने न केवल अभिनय की बारीकियां देखीं, बल्कि यह भी समझा कि असली जादू कैमरे के पीछे है।

आरके नय्यर के सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने अनुशासन सीखा। उनकी मेहनत का ही असर था कि दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म ‘बलिदान’ (1971) से स्वतंत्र निर्देशन का मौका मिला।

रवि टंडन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे किसी एक ‘खांचे’ में बंद होकर नहीं रहे। सत्तर के दशक में जहां मार-धाड़ वाली फिल्मों का बोलबाला था, टंडन ने मनोवैज्ञानिक रहस्यों और म्यूजिकल थ्रिलर्स का एक नया संसार रचा।

संजीव कुमार के साथ बनाई गई फिल्म ‘अनहोनी’ (1973) आज भी कल्ट क्लासिक मानी जाती है। इसमें एक मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति की कहानी को जिस संवेदनशीलता और रहस्य के साथ उन्होंने बुना, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे।

अमिताभ बच्चन के ‘एंग्री यंग मैन’ दौर में टंडन ने उन्हें एक लाचार लेकिन दृढ़निश्चयी ‘विजय’ के रूप में पेश किया। फिल्म ‘मजबूर’ (1974) की गति और इसका क्लाइमेक्स आज के दौर के थ्रिलर्स को भी मात देता है।

क्या कोई सोच सकता था कि कॉलेज की मस्ती, आरडी बर्मन का झूमता संगीत और एक खौफनाक कत्ल की गुत्थी एक साथ मिल सकते हैं? रवि टंडन ने ‘म्यूजिकल मिस्ट्री’ की इस विधा को फिल्म ‘खेल खेल में’ (1975) जन्म दिया और ऋषि कपूर-नीतू सिंह की जोड़ी को अमर बना दिया।

फिल्म जगत में ‘नेपोटिज्म’ पर बहस तो आज होती है, लेकिन रवि टंडन ने दशकों पहले एक मिसाल पेश की थी। उनकी बेटी रवीना टंडन जब बड़ी हुईं, तो रवि चाहते तो उन्हें खुद लॉन्च कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। रवीना को किसी फिल्म में ‘पुश’ नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि रवीना ने अपनी मेहनत से ‘पत्थर के फूल’ हासिल की और पिता की तरह ही विधाओं में विविधता (जैसे ‘शूल’ और ‘दमन’) को अपनाया। रवि टंडन के लिए परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। रवीना का नाम भी रवि और वीणा के नाम पर ही पड़ा है।

टंडन के निर्देशन की शैली को ‘क्रिस्प’ (सटीक) कहा जाता था। वे बेवजह फिल्म खींचने के बजाय पटकथा की गति पर ध्यान देते थे। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और पंचम दा (आरडी बर्मन) के साथ उनके तालमेल ने हमें ऐसे गीत दिए जो आज भी शादियों और पार्टियों की जान हैं। चाहे वह “खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे” हो या “अंग्रेजी में कहते हैं कि आई लव यू”।

11 फरवरी 2022 को रवि टंडन ने अंतिम सांस ली। जुहू में उनके सम्मान में एक चौक का नाम ‘रवि टंडन चौक’ रखा गया है। 2020 में उन्हें ब्रज रत्न अवॉर्ड मिला।

–आईएएनएस

वीकेयू/एबीएम


Related Articles

Latest News