कोलकाता। साल 1952 से लेकर 2016 तक बंगाल की राजनीति और विशेषकर चुनावी विमर्श में सर्वहारा, किसानों-मजदूरों और आमजनों के मुद्दे हावी हुआ करते थे, लेकिन 2016 के बाद से देखा जा रहा है कि विधानसभा हो या फिर लोकसभा चुनाव जन सरोकार के मुद्दे पीछे चले जा रहे हैं। अब जाति-धर्म और क्षेत्र आधारित आइडेंटिटी पॉलिटिक्स यानी पहचान की राजनीति जमकर की जा रही है।
Lok Sabha Election 2024:बंगाल में श्रीराम, संदेशखाली समेत कई मुद्दों पर हो रही सियासी जंग,
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